महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रूयतां चित्रगुप्तस्य भाषितं मम च प्रियम् ।। १४ ।। **यमराजने कहा—**देवताओ और महर्षियो! मैंने आपलोगोंके मुखसे दिव्य एवं मनोरम कथा सुनी है, अब आपलोग चित्रगुप्तका तथा मेरा भी प्रिय भाषण सुनिये ।। रहस्यं धर्मसंयुक्तं शक्यं श्रोतुं महर्षिभिः । श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता ।। १५ ।। इस धर्मयुक्त रहस्यको महर्षि भी सुन सकते हैं। अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको भी इसे श्रवण करना चाहिये ।। १५ ।। न हि पुण्यं तथा पापं कृतं किंचिद् विनश्यति । पर्वकाले च यत् किंचिदादित्यं चाधितिष्ठति ।। १६ ।। मनुष्यका किया हुआ कोई भी पुण्य तथा पाप भोगके बिना नष्ट नहीं होता। पर्वकालमें जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब सूर्यदेवके पास पहुँचता है ।। प्रेतलोकं गते मर्त्ये तत् तत् सर्वं विभावसुः । प्रतिजानाति पुण्यात्मा तच्च तत्रोपयुज्यते ।। १७ ।। जब मनुष्य प्रेतलोकको जाता है, उस समय सूर्यदेव वे सारी वस्तुएँ उसे अर्पित कर देते हैं और पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें उन वस्तुओंका उपभोग करता है ।। किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि चित्रगुप्तमतं शुभम् । पानीयं चैव दीपं च दातव्यं सततं तथा ।। १८ ।। अब मैं चित्रगुप्तके मतके अनुसार कुछ कल्याण-कारी धर्मका वर्णन करता हूँ। मनुष्यको जलदान और दीपदान सदा ही करने चाहिये ।। १८ ।। उपानहौ च छत्रं च कपिला च यथातथम् । पुष्करे कपिला देया ब्राह्मणे वेदपारगे ।। १९ ।। अग्निहोत्रं च यत्नेन सर्वशः प्रतिपालयेत् । उपानह (जूता), छत्र तथा कपिला गौका भी यथोचित रीतिसे दान करना चाहिये। पुष्कर तीर्थमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला गाय देनी चाहिये और अग्निहोत्रके नियमका सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये ।। १९½ ।। अयं चैवापरो धर्मश्चित्रगुप्तेन भाषितः ।। २० ।। फलमस्य पृथक्त्वेन श्रोतुमर्हन्ति सत्तमाः । प्रलयं सर्वभूतैस्तु गन्तव्यं कालपर्ययात् ।। २१ ।। इसके सिवा यह एक दूसरा धर्म भी चित्रगुप्तने बताया है। उसके पृथक्-पृथक् फलका वर्णन सभी साधु पुरुष सुनें। समस्त प्राणी कालक्रमसे प्रलयको प्राप्त होते हैं ।। तत्र दुर्गमनुप्राप्ताः क्षुत्तृष्णारिपीडिताः । दह्यमाना विपच्यन्ते न तत्रास्ति पलायनम् ।। २२ ।।