महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1104, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव
भीष्म उवाच
ततः पद्मप्रतीकाशः पद्मोद्भूतः पितामहः ।
उवाच वचनं देवान् वासवं च शचीपतिम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर कमलके समान कान्तिमान् कमलोद्भव ब्रह्माजीने देवताओं तथा शचीपति इन्द्रसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
अयं महाबलो नागो रसातलचरो बली ।
तेजस्वी रेणुको नाम महासत्त्वपराक्रमः ॥ २ ॥
अतितेजस्विनः सर्वे महावीर्या महागजाः ।
धारयन्ति महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् ॥ ३ ॥
‘यह रसातलमें विचरनेवाला, महाबली, शक्ति-शाली, महान् सत्त्व और पराक्रमसे युक्त तेजस्वी रेणुक नामवाला नाग यहाँ उपस्थित है। सब-के-सब महान् गजराज (दिग्गज) अत्यन्त तेजस्वी और महापराक्रमी होते हैं। वे पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीको धारण करते हैं ॥ २-३ ॥
भवद्भिः समनुज्ञातो रेणुकस्तान् महागजान् ।
धर्मगुह्यानि सर्वाणि गत्वा पृच्छतु तत्र वै ॥ ४ ॥
‘यदि आपलोग आज्ञा दें तो रेणुक उन महान् गजोंके पास जाकर धर्मके समस्त गोपनीय रहस्योंको पूछे’ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा ते देवा रेणुकं तदा ।
प्रेषयामासुरव्यग्रा यत्र ते धरणीधराः ॥ ५ ॥
पितामह ब्रह्माजीकी बात सुनकर शान्त चित्तवाले देवताओंने उस समय रेणुकको उस स्थानपर भेजा, जहाँ पृथ्वीको धारण करनेवाले वे दिग्गज मौजूद थे ॥ ५ ॥
रेणुक उवाच
अनुज्ञातोऽस्मि देवैश्च पितृभिश्च महाबलाः ।
धर्मगुह्यानि युष्माकं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
कथयध्वं महाभागा यद् वस्तत्त्वं मनीषितम् ॥ ६ ॥
रेणुकने कहा— महाबली दिग्गजो! मुझे देवताओं और पितरोंने आज्ञा दी है, इसलिये यहाँ आया हूँ और आपलोगोंके जो धर्मविषयक गूढ़ विचार हैं, उन्हें मैं यथार्थरूपसे सुनना