महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1105, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाहता हूँ। महाभाग दिग्गजो! आपकी बुद्धिमें जो धर्मका तत्त्व निहित हो, उसे कहिये॥ ६॥
दिग्गजा ऊचुः
कार्तिके मासि चाश्लेषा बहुलस्याष्टमी शिवा।
तेन नक्षत्रयोगेन यो ददाति गुडौदनम्॥ ७॥
इमं मन्त्रं जपन् श्राद्धे यताहारो ह्यकोपनः।
**दिग्गजोंने कहा—**कार्तिक मासके कृष्णपक्षमें आश्लेषा नक्षत्र और मंगलमयी अष्टमी तिथिका योग होनेपर जो मनुष्य आहार-संयमपूर्वक क्रोधशून्य हो निम्नांकित मन्त्रका पाठ करते हुए श्राद्धके अवसरपर हमारे लिये गुड़मिश्रित भात देता है (वह महान् फलका भागी होता है)॥
बलदेवप्रभृतयो ये नागा बलवत्तराः॥ ८॥
अनन्ता ह्याक्षया नित्यं भोगिनः सुमहाबलाः।
तेषां कुलोद्भवा ये च महाभूता भुजङ्गमाः॥ ९॥
ते मे बलिं प्रतीच्छन्तु बलतेजोऽभिवृद्धये।
यदा नारायणः श्रीमानुज्जहार वसुंधराम्॥ १०॥
तद् बलं तस्य देवस्य धरामुद्धरतस्तथा।
'बलदेव (शेष या अनन्त) आदि जो अत्यन्त बलशाली नाग हैं, वे अनन्त, अक्षय, नित्य फनधारी और महाबली हैं। वे तथा उनके कुलमें उत्पन्न हुए जो अन्य विशाल भुजंगम हों, वे भी मेरे तेज और बलकी वृद्धिके लिये मेरी दी हुई इस बलिको ग्रहण करें। जब श्रीमान् भगवान् नारायणने इस पृथ्वीका एकार्णवके जलसे उद्धार किया था, उस समय इस वसुन्धराका उद्धार करते हुए उन भगवान्के श्रीविग्रहमें जो बल था, वह मुझे प्राप्त हो'॥ ८—१० १/२॥
एवमुक्त्वा बलिं तत्र वल्मीके तु निवेदयेत्॥ ११॥
गजेन्द्रकुसुमाकीर्णं नीलवस्त्रानुलेपनम्।
निर्वपेत् तं तु वल्मीके अस्तं याते दिवाकरे॥ १२॥
इस प्रकार कहकर किसी बाँबीपर बलि निवेदन करे। उसपर नागकेसर बिखेर दे, चन्दन चढ़ा दे और उसे नीले कपड़ेसे ढक दे तथा सूर्यास्त होनेपर उस बलिको बाँबीके पास रख दे॥ ११-१२॥
एवं तृप्तास्ततः सर्वे अधस्ताद्भारपीडिताः।
श्रमं तं नावबुध्यामो धारयन्तो वसुंधराम्॥ १३॥
एवं मन्यामहे सर्वे भारार्ता निरपेक्षिणः।