भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 111

कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भवांश्चोदङ्मुखः शुचिः । स च तत् कृतवान् शूद्रः सर्वं यदृषिरब्रवीत् ॥ ३१ ॥ 'तुम इस कुशकी चटाईका अग्रभाग तो पूर्व दिशाकी ओर करो और स्वयं शुद्ध होकर उत्तराभिमुख बैठो।' ऋषिने जो-जो कहा, शूद्रने वह सब किया ॥ ३१ ॥ यथोपदिष्टं मेधावी दर्भाग्र्यादि यथातथम् । हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना ॥ ३२ ॥ बुद्धिमान् शूद्रने कुश, अर्घ्य आदि तथा हव्य-कव्यकी विधि—सब कुछ उन तपस्वी मुनिके उपदेशके अनुसार ठीक-ठीक किया ॥ ३२ ॥ ऋषिणा पितृकार्ये च स च धर्मपथे स्थितः । पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ॥ ३३ ॥ ऋषिके द्वारा पितृकार्य विधिवत् सम्पन्न हो जानेपर वे ऋषि शूद्रसे विदा लेकर चले गये और वह शूद्र धर्ममार्गमें स्थित हो गया ॥ ३३ ॥ अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यन् शूद्रतापसः । वने पञ्चत्वमगमत् सुकृतेन च तेन वै ॥ ३४ ॥ अजायत महाराजवंशे स च महाद्युतिः । तदनन्तर दीर्घकालतक तपस्या करके वह शूद्र तपस्वी वनमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ और उसी पुण्यके प्रभावसे एक महान् राजवंशमें महातेजस्वी बालकके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३४ १/२ ॥ तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह ॥ ३५ ॥ पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ । एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा ॥ ३६ ॥ क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ॥ ३७ ॥ तात! इसी प्रकार वे ऋषि भी कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हुए। भरतश्रेष्ठ! वे ही ऋषि दूसरे जन्ममें उसी राजवंशके पुरोहितके कुलमें उत्पन्न हुए। इस प्रकार वह शूद्र और वे मुनि दोनों ही वहाँ उत्पन्न हुए, क्रमशः बढ़े और सब प्रकारकी विद्याओंमें निपुण हो गये ॥ अथर्ववेदे वेदे च बभूवर्षिः सुनिश्चितः । कल्पप्रयोगे चोत्पन्ने ज्योतिषे च परं गतः ॥ ३८ ॥ सांख्ये चैव परा प्रीतिस्तस्य चैवं व्यवर्धत । वे ऋषि वेद और अथर्ववेदके परिनिष्ठित विद्वान् हो गये। कल्पप्रयोग और ज्योतिषमें भी पारंगत हुए। सांख्यमें भी उनका परम अनुराग बढ़ने लगा ॥ ३८ १/२ ॥ पितर्युपरते चापि कृतशौचस्तु पार्थिव ॥ ३९ ॥ अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः ।