महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरेश! पिताके परलोकवासी हो जानेपर शुद्ध होनेके पश्चात् मन्त्री और प्रजा आदिने मिलकर उस राजकुमारको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया ।। अभिषिक्तेन स ऋषिरभिषिक्तः पुरोहितः ॥ ४० ॥ राजाके अभिषिक्त होनेके साथ ही उस ऋषिका भी पुरोहितके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ ४० ॥ स तं पुरोधाय सुखमवसद भरतर्षभ । राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालयन् ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! ऋषिको पुरोहित बनाकर वह राजा सुखपूर्वक रहने और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्यका शासन करने लगा ॥ ४१ ॥ पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् । उत्स्मयन् प्राहसच्चापि दृष्ट्वा राजा पुरोहितम् ॥ ४२ ॥ जब पुरोहितजी प्रतिदिन पुण्याहवाचन करते और निरन्तर धर्मकार्यमें संलग्न रहते, उस समय राजा उन्हें देखकर कभी मुसकराते और कभी जोर-जोरसे हँसने लगते थे ॥ ४२ ॥ एवं स बहुशो राजन् पुरोधसमुपाहसत् । लक्षयित्वा पुरोधास्तु बहुशस्तं नराधिपम् ॥ ४३ ॥ उत्स्मयन्तं च सततं दृष्ट्वासौ मन्युमाविशत् । राजन्! इस प्रकार अनेक बार राजाने पुरोहितका उपहास किया। पुरोहितने जब अनेक बार और निरन्तर उस राजाको अपने प्रति हँसते और मुसकराते लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा खेद और क्षोभ हुआ ।। अथ शून्ये पुरोधास्तु सह राज्ञा समागतः ॥ ४४ ॥ कथाभिरनुकूलाभी राजानं चाभ्यरोचयत् । तदनन्तर एक दिन पुरोहितजी राजासे एकान्तमें मिले और मनोनुकूल कथाएँ सुनाकर राजाको प्रसन्न करने लगे ॥ ४४ ½ ॥ ततोऽब्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ ॥ ४५ ॥ वरमिच्छाम्यहं त्वेकं त्वया दत्तं महाद्युते ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! फिर पुरोहित राजासे इस प्रकार बोले—‘महातेजस्वी नरेश! मैं आपका दिया हुआ एक वर प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ ४५-४६ ॥
राजोवाच
वराणां ते शतं दद्यां किं बतैकं द्विजोत्तम । स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव ॥ ४७ ॥ **राजाने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! मैं आपको सौ वर दे सकता हूँ। एककी तो बात ही क्या। आपके प्रति मेरा जो स्नेह और विशेष आदर है, उसे देखते हुए मेरे पास आपके लिये कुछ