महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नरेश! पिताके परलोकवासी हो जानेपर शुद्ध होनेके पश्चात् मन्त्री और प्रजा आदिने मिलकर उस राजकुमारको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया ।। अभिषिक्तेन स ऋषिरभिषिक्तः पुरोहितः ॥ ४० ॥ राजाके अभिषिक्त होनेके साथ ही उस ऋषिका भी पुरोहितके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ ४० ॥ स तं पुरोधाय सुखमवसद भरतर्षभ । राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालयन् ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! ऋषिको पुरोहित बनाकर वह राजा सुखपूर्वक रहने और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्यका शासन करने लगा ॥ ४१ ॥ पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् । उत्स्मयन् प्राहसच्चापि दृष्ट्वा राजा पुरोहितम् ॥ ४२ ॥ जब पुरोहितजी प्रतिदिन पुण्याहवाचन करते और निरन्तर धर्मकार्यमें संलग्न रहते, उस समय राजा उन्हें देखकर कभी मुसकराते और कभी जोर-जोरसे हँसने लगते थे ॥ ४२ ॥ एवं स बहुशो राजन् पुरोधसमुपाहसत् । लक्षयित्वा पुरोधास्तु बहुशस्तं नराधिपम् ॥ ४३ ॥ उत्स्मयन्तं च सततं दृष्ट्वासौ मन्युमाविशत् । राजन्! इस प्रकार अनेक बार राजाने पुरोहितका उपहास किया। पुरोहितने जब अनेक बार और निरन्तर उस राजाको अपने प्रति हँसते और मुसकराते लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा खेद और क्षोभ हुआ ।। अथ शून्ये पुरोधास्तु सह राज्ञा समागतः ॥ ४४ ॥ कथाभिरनुकूलाभी राजानं चाभ्यरोचयत् । तदनन्तर एक दिन पुरोहितजी राजासे एकान्तमें मिले और मनोनुकूल कथाएँ सुनाकर राजाको प्रसन्न करने लगे ॥ ४४ ½ ॥ ततोऽब्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ ॥ ४५ ॥ वरमिच्छाम्यहं त्वेकं त्वया दत्तं महाद्युते ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! फिर पुरोहित राजासे इस प्रकार बोले—‘महातेजस्वी नरेश! मैं आपका दिया हुआ एक वर प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ ४५-४६ ॥
राजोवाच
वराणां ते शतं दद्यां किं बतैकं द्विजोत्तम । स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव ॥ ४७ ॥ **राजाने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! मैं आपको सौ वर दे सकता हूँ। एककी तो बात ही क्या। आपके प्रति मेरा जो स्नेह और विशेष आदर है, उसे देखते हुए मेरे पास आपके लिये कुछ
भी अदेय नहीं है ।। ४७ ।।
पुरोहित उवाच
एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टोऽसि पार्थिव ।
प्रतिजानीहि तावत् त्वं सत्यं यद् वद नानृतम् ।। ४८ ।।
**पुरोहितने कहा—**पृथ्वीनाथ! यदि आप प्रसन्न हों तो मैं एक ही वर चाहता हूँ। आप पहले यह प्रतिज्ञा कीजिये कि 'मैं दूँगा।' इस विषयमें सत्य कहिये, झूठ न बोलिये ।। ४८ ।।
भीष्म उवाच
बाढमित्येव तं राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिर ।
यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन् न तु संवदे ।। ४९ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब राजाने उत्तर दिया—'बहुत अच्छा। यदि मैं जानता होऊँगा तो अवश्य बता दूँगा और यदि नहीं जानता होऊँगा तो नहीं बताऊँगा' ।। ४९ ।।
पुरोहित उवाच
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकृत्येषु चासकृत् ।
शान्तिहोमेषु च सदा किं त्वं हससि वीक्ष्य माम् ।। ५० ।।
**पुरोहितजीने कहा—**महाराज! प्रतिदिन पुण्याह-वाचनके समय तथा बारंबार धार्मिक कृत्य कराते समय एवं शान्तिहोमके अवसरोंपर आप मेरी ओर देखकर क्यों हँसा करते हैं? ।। ५० ।।
सव्रीडं वै भवति हि मनो मे हसता त्वया ।
कामया शापितो राजन् नान्यथा वक्तुमर्हसि ।। ५१ ।।
आपके हँसनेसे मेरा मन लज्जित-सा हो जाता है। राजन्! मैं शपथ दिलाकर पूछ रहा हूँ, आप इच्छानुसार सच-सच बताइये। दूसरी बात कहकर बहलाइयेगा मत ।। ५१ ।।
सुव्यक्तं कारणं ह्यत्र न ते हास्यमकारणम् ।
कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथयस्व मे ।। ५२ ।।
आपके इस हँसनेमें स्पष्ट ही कोई विशेष कारण जान पड़ता है। आपका हँसना बिना किसी कारणके नहीं हो सकता। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; अतः आप यथार्थ रूपसे यह सब कहिये ।। ५२ ।।
राजोवाच
एवमुक्ते त्वया विप्र यदवाच्यं भवेदपि ।
अवश्यमेव वक्तव्यं शृणुष्वैकमना द्विज ।। ५३ ।।
**राजाने कहा—**विप्रवर! आपके इस प्रकार पूछनेपर तो यदि कोई न कहने योग्य बात हो तो उसे भी अवश्य ही कह देना चाहिये। अतः आप मन लगाकर सुनिये॥ ५३॥
पूर्वदेहे यथा वृत्तं तन्निबोध द्विजोत्तम।
जातिं स्मराम्यहं ब्रह्मन्नवधानेन मे शृणु॥ ५४॥
द्विजश्रेष्ठ! जब हमने पूर्वजन्ममें शरीर धारण किया था, उस समय जो घटना घटित हुई थी, उसे सुनिये। ब्रह्मन्! मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है। आप ध्यान देकर मेरी बात सुनिये॥ ५४॥
शूद्रोऽहमभवं पूर्वं तापसो भृशसंयुतः।
ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाभूद् द्विजसत्तम॥ ५५॥
विप्रवर! पहले जन्ममें मैं शूद्र था। फिर बड़ा भारी तपस्वी हो गया। उन्हीं दिनों आप उग्र तप करनेवाले श्रेष्ठ महर्षि थे॥ ५५॥
प्रीयता हि तदा ब्रह्मन् ममानुग्रहबुद्धिना।
पितृकार्ये त्वया पूर्वमुपदेशः कृतोऽनघ॥ ५६॥
निष्पाप ब्रह्मन्! उन दिनों आप मुझसे बड़ा प्रेम रखते थे; अतः मेरे ऊपर अनुग्रह करनेके विचारसे आपने पितृकार्यमें मुझे आवश्यक विधिका उपदेश किया था॥ ५६॥
बृस्यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम।
एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजायथाः॥ ५७॥
मुनिश्रेष्ठ! कुशके चट कैसे रखे जायँ? कुशा कैसे बिछायी जाय? हव्य और कव्य कैसे समर्पित किये जायँ? इन्हीं सब बातोंका आपने मुझे उपदेश दिया था। इसी कर्मदोषके कारण आपको इस जन्ममें पुरोहित होना पड़ा॥ ५७॥
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम्।
मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयावाप्तमिदं फलम्॥ ५८॥
विप्रेन्द्र! यह कालका उलट-फेर तो देखिये कि मैं तो शूद्रसे राजा हो गया और मुझे ही उपदेश करनेके कारण आपको यह फल मिला॥ ५८॥
एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मन् प्रहसे त्वां द्विजोत्तम।
न त्वां परिभवन् ब्रह्मन् प्रहसामि गुरुर्भवान्॥ ५९॥
द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैं आपकी ओर देखकर हँसता हूँ। आपका अनादर करनेके लिये मैं आपकी हँसी नहीं उड़ाता हूँ; क्योंकि आप मेरे गुरु हैं॥
विपर्ययेण मे मन्युस्तेन संतप्यते मनः।
जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै॥ ६०॥
यह जो उलट-फेर हुआ है, इससे मुझको बड़ा खेद है और इसीसे मेरा मन संतप्त रहता है। मैं अपनी और आपकी भी पूर्वजन्मकी बातोंको याद करता हूँ; इसीलिये आपकी ओर देखकर हँस देता हूँ॥ ६०॥
एवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् । पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ॥ ६१ ॥ आपकी उग्र तपस्या थी, वह मुझे उपदेश देनेके कारण नष्ट हो गयी। अतः आप पुरोहितका काम छोड़कर पुनः संसार-सागरसे पार होनेके लिये प्रयत्न कीजिये ॥ ६१ ॥
इतस्त्वमधमामन्यां मा योनिं प्राप्स्यसे द्विज । गृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम ॥ ६२ ॥ ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कहीं ऐसा न हो कि आप इसके बाद दूसरी किसी नीच योनिमें पड़ जायँ। अतः विप्रवर! जितना चाहिये धन ले लीजिये और अपने अन्तःकरणको पवित्र बनानेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६२ ॥
भीष्म उवाच
ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्यनेकशः । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्च सर्वशः ॥ ६३ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर राजासे विदा लेकर पुरोहितने बहुत-से ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। धन, भूमि और ग्राम भी वितरण किये ॥ ६३ ॥
कृच्छ्राणि चीर्त्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमैः । तीर्थानि चापि गत्वा वै दानानि विविधानि च ॥ ६४ ॥ उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके बताये अनुसार उन्होंने अनेक प्रकारके कृच्छ्रव्रत किये और तीर्थोंमें जाकर नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान कीं ॥ ६४ ॥
दत्त्वा गाश्चैव विप्रेभ्यः पूतात्माभवदात्मवान् । तमेव चाश्रमं गत्वा चचार विपुलं तपः ॥ ६५ ॥ ब्राह्मणोंको गोदान करके पवित्रात्मा होकर उन मनस्वी ब्राह्मणने फिर उसी आश्रमपर जाकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ६५ ॥
ततः सिद्धिं परां प्राप्तो ब्राह्मणो राजसत्तम । सम्मतश्चाभवत् तेषामाश्रमे तन्निवासिनाम् ॥ ६६ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर परम सिद्धिको प्राप्त होकर वे ब्राह्मण देवता उस आश्रममें रहनेवाले समस्त साधकोंके लिये सम्माननीय हो गये ॥ ६६ ॥
एवं प्राप्तो महत्कृच्छ्रमृषिः सन्नृपसत्तम । ब्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद् वर्णावरे जने ॥ ६७ ॥ नृपशिरोमणे! इस प्रकार वे ऋषि शूद्रको उपदेश देनेके कारण महान् कष्टमें पड़ गये; इसलिये ब्राह्मणको चाहिये कि वह नीच वर्णके मनुष्यको उपदेश न दे ॥ ६७ ॥
(वर्जयेदुपदेशं च सदैव ब्राह्मणो नृप । उपदेशं हि कुर्वाणो द्विजः कृच्छ्रमवाप्नुयात् ।
नरेश्वर! ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी शूद्रको उपदेश न दे; क्योंकि उपदेश करनेवाला ब्राह्मण स्वयं ही संकटमें पड़ जाता है ॥ नेषितव्यं सदा वाचा द्विजेन नृपसत्तम । न च प्रवक्तव्यमिह किंचिद् वर्णावरे जने ॥) नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणको अपनी वाणीद्वारा कभी उपदेश देनेकी इच्छा ही नहीं करनी चाहिये। यदि करे भी तो नीच वर्णके पुरुषको तो कदापि कुछ उपदेश न दे ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः । एतेषु कथयन् राजन् ब्राह्मणो न प्रदुष्यति ॥ ६८ ॥ राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं। इन्हें उपदेश देनेवाला ब्राह्मण दोषका भागी नहीं होता है ॥ ६८ ॥ तस्मात् सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित् किंचिदग्रतः । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्यकृतात्मभिः ॥ ६९ ॥ इसलिये सत्पुरुषोंको कभी किसीके सामने कोई उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है। जिन्होंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध एवं वशीभूत नहीं कर लिया है, उनके लिये धर्मकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है ॥ ६९ ॥ तस्मान्मौनेन मुनयो दीक्षां कुर्वन्ति चादृताः । दुरुक्तस्य भयाद् राजन् नाभाषन्ते च किंचन ॥ ७० ॥ राजन्! इसीलिये ऋषि-मुनि मौनभावसे ही आदरपूर्वक दीक्षा देते हैं। कोई अनुचित बात मुँहसे न निकल जाय, इसीके भयसे वे कोई भाषण नहीं देते हैं ॥ धार्मिका गुणसम्पन्नाः सत्यार्जवसमन्विताः । दुरुक्तवाचाभिहितैः प्राप्नुवन्तीह दुष्कृतम् ॥ ७१ ॥ धार्मिक, गुणवान् तथा सत्य-सरलता आदि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष भी शास्त्रविरुद्ध अनुचित वचन कह देनेके कारण यहाँ दुष्कर्मके भागी हो जाते हैं ॥ ७१ ॥ उपदेशो न कर्तव्यः कदाचिदपि कस्यचित् । उपदेशाद्धि तत् पापं ब्राह्मणः समवाप्नुयात् ॥ ७२ ॥ ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी किसीको उपदेश न करे; क्योंकि उपदेश करनेसे वह शिष्यके पापको स्वयं ग्रहण करता है ॥ ७२ ॥ विमृश्य तस्मात् प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता । सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि ॥ ७३ ॥ अतः धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् पुरुषको बहुत सोच-विचारकर बोलना चाहिये; क्योंकि साँच और झूठमिश्रित वाणीसे किया गया उपदेश हानिकारक होता है ॥ ७३ ॥ वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्चित्य विनिश्चयम् ।
स चोपदेशः कर्तव्यो येन धर्ममवाप्नुयात् ॥ ७४ ॥ यहाँ किसीके पूछनेपर बहुत सोच-विचारकर शास्त्रका जो सिद्धान्त हो वही बताना चाहिये तथा उपदेश वह करना चाहिये जिससे धर्मकी प्राप्ति हो ॥ ७४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातमुपदेशकृते मया ।
महान् क्लेशो हि भवति तस्मान्नोपदिशेदिह ॥ ७५ ॥
उपदेशके सम्बन्धमें मैंने ये सब बातें तुम्हें बतायी हैं। अनधिकारीको उपदेश देनेसे महान् क्लेश प्राप्त होता है। इसलिये यहाँ किसीको उपदेश न दे ॥ ७५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शूद्रमुनिसंवादे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शूद्र और मुनिका संवादविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७७ श्लोक हैं)
एकादशोऽध्यायः
लक्ष्मीके निवास करने और न करने योग्य पुरुष, स्त्री और स्थानोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशे पुरुषे तात स्त्रीषु वा भरतर्षभ ।
श्रीः पद्मा वसते नित्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— तात! भरतश्रेष्ठ! कैसे पुरुषमें और किस तरहकी स्त्रियोंमें लक्ष्मी नित्य निवास करती हैं? पितामह! यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं यथाश्रुतम् ।
रुक्मिणी देवकीपुत्रसंनिधौ पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें एक यथार्थ वृत्तान्तको मैंने जैसा सुना है, उसीके अनुसार तुम्हें बता रहा हूँ। देवकीनन्दन श्रीकृष्णके समीप रुक्मिणीदेवीने साक्षात् लक्ष्मीसे जो कुछ पूछा था, वह मुझसे सुनो ॥ २ ॥
नारायणस्याङ्कगतां ज्वलन्तीं
दृष्ट्वा श्रियं पद्मसमानवर्णाम् ।
कौतूहलाद् विस्मितचारुनेत्रा
पप्रच्छ माता मकरध्वजस्य ॥ ३ ॥
भगवान् नारायणके अङ्कमें बैठी हुई कमलके समान कान्तिवाली लक्ष्मीदेवीको अपनी प्रभासे प्रकाशित होती देख जिसके मनोहर नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे थे, उन प्रद्युम्नजननी रुक्मिणीदेवीने कौतूहलवश लक्ष्मीसे पूछा— ॥ ३ ॥
कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं
संतिष्ठसे कानिव सेवसे त्वम् ।
तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते
तत्त्वेन मे ब्रूहि महर्षिकन्ये ॥ ४ ॥
‘महर्षि भृगुकी पुत्री तथा त्रिलोकीनाथ भगवान् नारायणकी प्रियतमे! देवि! तुम इस जगत्में किन प्राणियोंपर कृपा करके उनके यहाँ रहती हो? कहाँ निवास करती हो और किन-किनका सेवन करती हो? उन सबको मुझे यथार्थरूपसे बताओ’ ॥ ४ ॥
एवं तदा श्रीरभिभाष्यमाणा
देव्या समक्षं गरुडध्वजस्य ।
उवाच वाक्यं मधुराभिधानं मनोहरं चन्द्रमुखी प्रसन्ना ॥ ५ ॥ रुक्मिणीके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमुखी लक्ष्मीदेवीने प्रसन्न होकर भगवान् गरुडध्वजके सामने ही मीठी वाणीमें यह वचन कहा ॥ ५ ॥
श्रीरुवाच
वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने । अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे ॥ ६ ॥ **लक्ष्मी बोलीं—**देवि! मैं प्रतिदिन ऐसे पुरुषमें निवास करती हूँ जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देवाराधनतत्पर, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा बढ़े हुए सत्त्वगुणसे युक्त हो ॥ ६ ॥
नाकर्मशीले पुरुषे वसामि न नास्तिके साङ्करिके कृतघ्ने । न भिन्नवृत्ते न नृशंसवर्णे न चापि चौरे न गुरुष्वसूये ॥ ७ ॥ जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनोंके दोष देखनेवाला हो, उसके भीतर मैं निवास नहीं करती हूँ ॥ ७ ॥
ये चाल्पतेजोबलसत्त्वमानाः क्लिश्यन्ति कुप्यन्ति च यत्र तत्र । न चैव तिष्ठामि तथाविधेषु नरेषु संगुप्तमनोरथेषु ॥ ८ ॥ जिनमें तेज, बल, सत्त्व और गौरवकी मात्रा बहुत थोड़ी है, जो जहाँ-तहाँ हर बातमें खिन्न हो उठते हैं, जो मनमें दूसरा भाव रखते हैं और ऊपरसे कुछ और ही दिखाते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं निवास नहीं करती हूँ ॥ ८ ॥
यश्चात्मनि प्रार्थयते न किञ्चिद् यश्च स्वभावोपहतान्तरात्मा । तेष्वल्पसंतोषपरेषु नित्यं नरेषु नाहं निवसामि सम्यक् ॥ ९ ॥ जो अपने लिये कुछ नहीं चाहता, जिसका अन्तःकरण मूढ़तासे आच्छन्न है, जो थोड़ेमें ही संतोष कर लेते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं भलीभाँति नित्य निवास नहीं करती हूँ ॥
स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु
वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते । कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु दान्तासु तथाऽबलासु ॥ १० ॥ सत्यस्वभावार्जवसंयुतासु वसामि देवद्विजपूजिकासु । जो स्वभावतः स्वधर्मपरायण, धर्मज्ञ, बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें तत्पर, जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले, क्षमाशील और सामर्थ्यशाली हैं, ऐसे पुरुषोंमें तथा क्षमाशील एवं जितेन्द्रिय अबलाओंमें भी मैं निवास करती हूँ। जो स्त्रियाँ स्वभावतः सत्यवादिनी तथा सरलतासे संयुक्त हैं, जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करनेवाली हैं, उनमें भी मैं निवास करती हूँ ॥ १० १/२ ॥ (अबन्ध्यकालेषु सदा दानशौचरतेषु च । ब्रह्मचर्यतपोज्ञानगोद्विजातिप्रियेषु च ॥ जो अपने समयको कभी व्यर्थ नहीं जाने देते, सदा दान एवं शौचाचारमें तत्पर रहते हैं, जिन्हें ब्रह्मचर्य, तपस्या, ज्ञान, गौ और द्विज परम प्रिय हैं, ऐसे पुरुषोंमें मैं निवास करती हूँ।। वसामि स्त्रीषु कान्तासु देवद्विजपरासु च । विशुद्धगृहभाण्डासु गोधान्याभिरतासु च ॥) जो स्त्रियाँ कमनीय गुणोंसे युक्त, देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवामें तत्पर, घरके बर्तन-भाँड़ोंको शुद्ध तथा स्वच्छ रखनेवाली एवं गौओंकी सेवा तथा धान्यके संग्रहमें तत्पर होती हैं, उनमें भी मैं सदा निवास करती हूँ ।। प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं सदा च भर्तुः प्रतिकूलवादिनीम् ॥ ११ ॥ परस्य वेश्माभिरतामलज्जा- मेवंविधां तां परिवर्जयामि । जो घरके बर्तनोंको सुव्यवस्थित रूपसे न रखकर इधर-उधर बिखेरे रहती हैं, सोच-समझकर काम नहीं करती हैं, सदा अपने पतिके प्रतिकूल ही बोलती हैं, दूसरोंके घरोंमें घूमने-फिरनेमें आसक्त रहती हैं और लज्जाको सर्वथा छोड़ बैठती हैं, उनको मैं त्याग देती हूँ।। पापामचोक्षामवलेहिनीं च व्यपेतधैर्यां कलहप्रियां च ॥ १२ ॥ निद्राभिभूतां सततं शयाना- मेवंविधां तां परिवर्जयामि ।
जो स्त्री निर्दयतापूर्वक पापाचारमें तत्पर रहनेवाली, अपवित्र, चटोर, धैर्यहीन, कलहप्रिय, नींदमें बेसुध होकर सदा खाटपर पड़ी रहनेवाली होती है, ऐसी नारीसे मैं सदा दूर ही रहती हूँ ॥ १२ १/२ ॥
सत्यासु नित्यं प्रियदर्शनासु
सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासु ॥ १३ ॥
वसामि नारीषु पतिव्रतासु
कल्याणशीलासु विभूषितासु ।
जो स्त्रियाँ सत्यवादिनी और अपनी सौम्य वेश-भूषाके कारण देखनेमें प्रिय होती हैं, जो सौभाग्यशालिनी, सद्गुणवती, पतिव्रता एवं कल्याणमय आचार-विचारवाली होती हैं तथा जो सदा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रहती हैं, ऐसी स्त्रियोंमें मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १३ १/२ ॥
यानेषु कन्यासु विभूषणेषु
यज्ञेषु मेघेषु च वृष्टिमत्सु ॥ १४ ॥
वसामि फुल्लासु च पद्मिनीषु
नक्षत्रवीथीषु च शारदीषु ।
गजेषु गोष्ठेषु तथाऽऽसनेषु
सरःसु फुल्लोत्पलपङ्कजेषु ॥ १५ ॥
सुन्दर सवारियोंमें, कुमारी कन्याओंमें, आभूषणोंमें, यज्ञोंमें, वर्षा करनेवाले मेघोंमें, खिले हुए कमलोंमें, शरद् ऋतुकी नक्षत्र-मालाओंमें, हाथियों और गोशालाओंमें, सुन्दर आसनोंमें तथा खिले हुए उत्पल और कमलोंसे सुशोभित सरोवरोंमें मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १४-१५ ॥
नदीषु हंसस्वननादितासु
क्रौञ्चावघुष्टस्वरशोभितासु ।
विकीर्णकूलद्रुमराजितासु
तपस्विसिद्धद्विजसेवितासु ॥ १६ ॥
वसामि नित्यं सुबहूदकासु
सिंहैर्गजैश्चाकुलितोदकासु ।
जहाँ हँसोंकी मधुर ध्वनि गूँजती रहती है, क्रौंच पक्षीके कलरव जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो अपने तटोंपर फैले हुए वृक्षोंकी श्रेणियोंसे शोभायमान हैं, जिनके किनारे तपस्वी, सिद्ध और ब्राह्मण निवास करते हैं, जिनमें बहुत जल भरा रहता है तथा सिंह और हाथी जिनके जलमें अवगाहन करते रहते हैं, ऐसी नदियोंमें भी मैं सदा निवास करती रहती हूँ ॥ १६ १/२ ॥
मत्ते गजे गोवृषभे नरेन्द्र
सिंहासने सत्पुरुषेषु नित्यम् ।। १७ ।। यस्मिञ्जनो हव्यभुजं जुहोति गोब्राह्मणं चार्चति देवताश्च । काले च पुष्पैर्बलयः क्रियन्ते तस्मिन् गृहे नित्यमुपैमि वासम् ।। १८ ।। मतवाले हाथी, साँड़, राजा, सिंहासन और सत्पुरुषोंमें मेरा नित्य-निवास है। जिस घरमें लोग अग्निमें आहुति देते हैं, गौ, ब्राह्मण तथा देवताओंकी पूजा करते हैं और समय-समयपर जहाँ फूलोंसे देवताओंको उपहार समर्पित किये जाते हैं, उस घरमें मैं नित्य निवास करती हूँ ।। १७-१८ ।।
स्वाध्यायनित्येषु सदा द्विजेषु क्षात्रे च धर्माभिरते सदैव । वैश्ये च कृष्याभिरते वसामि शूद्रे च शुश्रूषणनित्ययुक्ते ।। १९ ।। सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणों, स्वधर्मपरायण क्षत्रियों, कृषि-कर्ममें लगे हुए वैश्यों तथा नित्य सेवापरायण शूद्रोंके यहाँ भी मैं सदा निवास करती हूँ ।। १९ ।।
नारायणे त्वेकमना वसामि सर्वेण भावेन शरीरभूता । तस्मिन् हि धर्मः सुमहान् निविष्टो ब्रह्मण्यता चात्र तथा प्रियत्वम् ।। २० ।। मैं मूर्तिमती एवं अनन्यचित्त होकर तो भगवान् नारायणमें ही सम्पूर्ण भावसे निवास करती हूँ; क्योंकि उनमें महान् धर्म संनिहित है। उनका ब्राह्मणोंके प्रति प्रेम है और उनमें स्वयं सर्वप्रिय होनेका गुण भी है ।।
नाहं शरीरेण वसामि देवि नैवं मया शक्यमिहाभिधातुम् । भावेन यस्मिन् निवसामि पुंसि स वर्धते धर्मयशोऽर्थकामैः ।। २१ ।। देवि! मैं नारायणके सिवा अन्यत्र शरीरसे नहीं निवास करती हूँ। मैं यहाँ ऐसा नहीं कह सकती कि सर्वत्र इसी रूपमें रहती हूँ। जिस पुरुषमें भावनाद्वारा निवास करती हूँ वह धर्म, यश, धन और कामसे सम्पन्न होकर सदा बढ़ता रहता है ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्रीरुक्मिणीसंवादे एकादशोऽध्यायः ।। ११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और रुक्मिणीका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)
द्वादशोऽध्यायः
कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान
(युधिष्ठिर उवाच
प्रायश्चित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह ।
मातापितॄन् गुरूंश्चैव येऽवमन्यन्ति मोहिताः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो मोहवश माता-पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये क्या प्रायश्चित्त है? यह बताइये ।।
ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपाः ।
तेषां गतिं महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।।
भीष्म उवाच
कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वतीः समाः ।
मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ।।
कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च ।
दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भवः ॥
**भीष्मजीने कहा—**तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है, सदाके लिये नरकमें पड़े रहना। जो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन नहीं रहते हैं वे कृमि, कीट, पिपीलिका और वृक्ष आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं। मनुष्ययोनिमें फिर जन्म होना उनके लिये दुर्लभ हो जाता है ।।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वत्सनाभो महाप्राज्ञो महर्षिः संशितव्रतः ॥
वल्मीकभूतो ब्रह्मर्षिस्तप्यते सुमहत्तपः ।
इस विषयमें जानकार मनुष्य इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं। वत्सनाभ नामवाले एक परम बुद्धिमान् महर्षि कठोर व्रतके पालनमें लगे थे। उनके शरीरपर दीमकोंने घर बना लिया था; अतः वे ब्रह्मर्षि बाँबीरूप हो गये थे और उसी अवस्थामें वे बड़ी भारी तपस्या करते थे ।।
तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो भरतर्षभ ।।
ववर्ष सुमहद् वर्षं सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
भरतश्रेष्ठ! उनके तप करते समय इन्द्रने बिजलीकी चमक और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी॥
तत्र सप्ताहवर्षं तु मुमुचे पाकशासनः ।
निमीलिताक्षस्तद्वर्षं प्रत्यगृह्णीत वै द्विजः ॥
पाकशासन इन्द्रने लगातार एक सप्ताहतक वहाँ जल बरसाया और वे ब्राह्मण वत्सनाभ आँख मूँदकर चुपचाप उस वर्षाका आघात सहन करते रहे॥
तस्मिन् पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते ।
विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीकोऽशनिताडितः ॥
सर्दी और हवासे युक्त वह वर्षा हो ही रही थी कि बिजलीसे आहत हो उस वल्मीक (बाँबी)-का शिखर टूटकर बिखर गया॥
ताड्यमाने ततस्तस्मिन् वत्सनाभे महात्मनि ।
कारुण्यात् तस्य धर्मः स्वमानृशंस्यमथाकरोत् ॥
अब महामना वत्सनाभपर उस वर्षाकी चोट पड़ने लगी। यह देख धर्मके हृदयमें करुणा भर आयी और उन्होंने वत्सनाभपर अपनी सहज दया प्रकट की॥
चिन्तयानस्य ब्रह्मर्षि तपन्तमधिधार्मिकम् ।
अनुरूपा मतिः क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ॥
तपस्यामें लगे हुए उन अत्यन्त धार्मिक ब्रह्मर्षिकी चिन्ता करते हुए धर्मके हृदयमें शीघ्र ही स्वाभाविक सुबुद्धिका उदय हुआ, जो उन्हींके अनुरूप थी॥
स्वं रूपं माहिषं कृत्वा सुमहन्तं मनोहरम् ।
त्राणार्थं वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरी स्थितः ॥
वे विशाल और मनोहर भैंसेका-सा अपना स्वरूप बनाकर वत्सनाभकी रक्षाके लिये उनके चारों ओर अपने चारों पैर जमाकर उनके ऊपर खड़े हो गये॥
यदा त्वपगतं वर्षं शीतवातसमन्वितम् ।
ततो महिषरूपी स धर्मो धर्मभृतां वर ॥
शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद् भरतर्षभ ।
स्थितेऽस्मिन् वृष्टिसम्पाते रक्षितः स महातपाः ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतभूषण युधिष्ठिर! जब शीतल हवासे युक्त वह वर्षा बंद हो गयी तब भैंसेका रूप धारण करनेवाले धर्म धीरेसे उस वल्मीकको छोड़कर वहाँसे दूर खिसक गये। उस मूसलाधार वर्षामें महिषरूपधारी धर्मके खड़े हो जानेसे महातपस्वी वत्सनाभकी रक्षा हो गयी॥
दिशः सुविपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ॥
दृष्ट्वा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम् ।
जलाशयान् स तान् दृष्ट्वा विप्रः प्रमुदितोऽभवत् ।।
तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ।।
अचिन्तयद् विस्मितश्च वर्षात् केनाभिरक्षितः ।
ततोऽपश्यत् तं महिषमवस्थितमदूरतः ।।
फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि ‘इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है। इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ।।
तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सलः ।
अतो नु भद्रं महिषः शिलापट्ट इव स्थितः ।
पीवरश्चैव शूल्यश्च बहुमांसो भवेदयम् ।।
‘अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था। इसीलिये मेरा भला हुआ है। यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है’ ।।
तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुनेः ।
कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिनः ।।
तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।।
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन ।
ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ।।
‘मैं प्राण-त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता। धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ।।
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् ।
कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृतिः ।।
‘पिता-माताका भरण-पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्चित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ।।
आकाङ्क्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् ।
तस्मात् प्राणान् परित्यक्ष्ये प्रायश्चित्तार्थमित्युत ।।
‘अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा। अतः मैं प्रायश्चित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा’ ।।
स मेरुशिखरं गत्वा निस्सङ्गेनान्तरात्मना ।
प्रायश्चित्तं कर्तुकामः शरीरं त्यक्तुमुद्यतः ।।
निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ।।
अनासक्त चित्तसे मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर प्रायश्चित्त करनेकी इच्छासे अपने शरीरको त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये। इसी समय धर्मने आकर उन धर्मज्ञ, धर्मात्मा वत्सनाभका हाथ पकड़ लिया ।।
धर्म उवाच
वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुषः ।
परितुष्टोऽस्मि त्यागेन निःसङ्गेन तथाऽऽत्मनः ।।
**धर्मने कहा—**महाप्राज्ञ वत्सनाभ! तुम्हारी आयु कई सौ वर्षोंकी है। तुम्हारे इस आसक्तिरहित आत्मत्यागके विचारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।।
एवं धर्मभृतः सर्वे विमृशन्ति तथा कृतम् ।
न स कश्चिद् वत्सनाभ यस्य नोपहतं मनः ।।
यश्चानवद्यश्चरति शक्तो धर्मं तु सर्वशः ।
निवर्तस्व महाप्राज्ञ भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ॥)
इसी प्रकार सभी धर्मात्मा पुरुष अपने किये हुए कर्मकी आलोचना करते हैं। वत्सनाभ! जगत्में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जिसका मन कभी दूषित न हुआ हो। जो मनुष्य निन्द्य कर्मोंसे दूर रहकर सब तरहसे धर्मका आचरण करता है वही शक्तिशाली है। महाप्राज्ञ! अब तुम प्राणत्यागके संकल्पसे निवृत्त हो जाओ, क्योंकि तुम सनातन (अजर-अमर) आत्मा हो ।।
युधिष्ठिर उवाच
स्त्रीपुंसयोः सम्प्रयोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् ।
एतस्मिन् संशये राजन् यथावद् वक्तुमर्हसि ।। १ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है (स्त्रीको या पुरुषको)? इस संशयके विषयमें आप यथावत्रूपसे बतानेकी कृपा करें ।। १ ।।
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत् पुरा ।। २ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें भी भंगास्वनके साथ इन्द्रका पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। २ ।।
पुरा भंगास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिकः ।
अपुत्रः पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थं यज्ञमाहरत् ।। ३ ।।
पुरुषसिंह! पहलेकी बात है, भंगास्वन नामसे प्रसिद्ध अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि पुत्रहीन
होनेके कारण पुत्र-प्राप्तिके लिये यज्ञ करते थे ।। ३ ।।
अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबलः ।
प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते ॥ ४ ॥
उन महाबली राजर्षिने अग्निष्टुत नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें इन्द्रकी
प्रधानता न होनेके कारण इन्द्र उस यज्ञसे द्वेष रखते हैं। वह यज्ञ मनुष्योंके प्रायश्चित्तके
अवसरपर अथवा पुत्रकी कामना होनेपर अभीष्ट मानकर किया जाता है ॥ ४ ।।
इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः ।
अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मनः ॥ ५ ॥
महाभाग देवराज इन्द्रको जब उस यज्ञकी बात मालूम हुई तब वे मनको वशमें
रखनेवाले राजर्षि भंगास्वनका छिद्र ढूँढ़ने लगे ।। ५ ।।
न चैवास्यान्तरं राजन् स ददर्श महात्मनः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य मृगयां गतवान् नृपः ।। ६ ।।
राजन्! बहुत ढूँढ़नेपर भी वे उस महामना नरेशका कोई छिद्र न देख सके। कुछ
कालके अनन्तर राजा भंगास्वन शिकार खेलनेके लिये वनमें गये ।। ६ ।।
इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत् ।
एकाश्वेन च राजर्षिर्भ्रान्त इन्द्रेण मोहितः ॥ ७ ॥
न दिशोऽविन्दत नृपः क्षुत्पिपासार्दितस्तदा ।
इतश्चेतश्च वै राजन् श्रमकृष्णाान्वितो नृप ।। ८ ।।
नरेश्वर! 'यही बदला लेनेका अवसर है' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने राजाको मोहमें डाल
दिया। इन्द्रद्वारा मोहित एवं भ्रान्त हुए राजर्षि भंगास्वन एकमात्र घोड़ेके साथ इधर-उधर
भटकने लगे। उन्हें दिशाओंका भी पता नहीं चलता था। वे भूख-प्याससे पीड़ित तथा
परिश्रम और तृष्णासे विकल हो इधर-उधर घूमते रहे ॥ ७-८ ।।
सरोऽपश्यत् सुरुचिरं पूर्णं परमवारिणा ।
सोऽवगाह्य सरस्तात पाययामास वाजिनम् ॥ ९ ॥
तात! घूमते-घूमते उन्होंने उत्तम जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा। उन्होंने
घोड़ेको उस सरोवरमें स्नान कराकर पानी पिलाया ।। ९ ।।
अथ पीतोदकं सोऽश्वं वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तमः ।
अवगाह्य ततः स्नातस्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान् ॥ १० ॥
जब घोड़ा पानी पी चुका तब उसे एक वृक्षमें बाँधकर वे श्रेष्ठ नरेश स्वयं भी जलमें
उतरे। उसमें स्नान करते ही वे राजा स्त्रीभावको प्राप्त हो गये ।। १० ।।
आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्ट्वा व्रीडितो नृपसत्तमः ।
चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतनः ॥ ११ ॥
अपनेको स्त्रीरूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। उनके सारे अन्तःकरणमें भारी चिन्ता व्याप्त हो गयी। उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल हो उठीं।। आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम्। इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम् ।। १२ ।। जातं महाबलानां मे तान् प्रवक्ष्यामि किं त्वहम् । दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च ।। १३ ।। वे स्त्रीरूपमें इस प्रकार सोचने लगे—अब मैं कैसे घोड़ेपर चढूँगी? कैसे नगरको जाऊँगी? मेरे अग्निष्टुत यज्ञके अनुष्ठानसे मुझे सौ महाबलवान् औरस पुत्र प्राप्त हुए हैं। उन सबसे क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों तथा नगर और जनपदके लोगोंमें कैसे जाऊँगी? ।। १२-१३ ।।
मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च। स्त्रीगुणा ऋषिभिः प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः ।। १४ ।। ‘धर्मके तत्त्वको देखने और जाननेवाले ऋषियोंने मृदुता, कृशता और व्याकुलता—ये स्त्रीके गुण बताये हैं ।। १४ ।।
व्यायामे कर्कशत्वं च वीर्यं च पुरुषे गुणाः। पौरुषं विप्रणष्टं वै स्त्रीत्वं केनापि मेऽभवत् ।। १५ ।। ‘परिश्रम करनेमें कठोरता और बल-पराक्रम—ये पुरुषके गुण हैं। मेरा पौरुष नष्ट हो गया और किसी अज्ञात कारणसे मुझमें स्त्रीत्व प्रकट हो गया ।। १५ ।।
स्त्रीभावात् पुनरश्वं तं कथमारोढुमुत्सहे । महता त्वथ यत्नेन आरुह्याश्वं नराधिपः ।। १६ ।। पुनरायात् पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तमः । ‘अब स्त्रीभाव आ जानेसे उस अश्वपर कैसे चढ़ सकूँगी?’ तात! किसी-किसी तरह महान् प्रयत्न करके वे स्त्रीरूपधारी नरेश घोड़ेपर चढ़कर अपने नगरमें आये ।। १६ १/२ ।।
पुत्र दारांश्च भृत्यांश्च पौरजानपदांश्च ते ।। १७ ।। किंस्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गताः । राजाके पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक तथा नगर और जनपदके लोग, ‘यह क्या हुआ?’—ऐसी जिज्ञासा करते हुए बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ।। १७ १/२ ।।
अथोवाच स राजर्षिः स्त्रीभूतो वदतां वरः ।। १८ ।। मृगयामस्मि निर्यातो बलैः परिवृतो दृढम् । उद्भ्रान्तः प्राविशं घोरमटवीं दैवचोदितः ।। १९ ।। तब स्त्रीरूपधारी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजर्षि भंगास्वन बोले—‘मैं अपनी सेनासे घिरकर शिकार खेलनेके लिये निकला था; परंतु दैवकी प्रेरणासे भ्रान्तचित्त होकर एक भयानक वनमें जा घुसा ।। १८-१९ ।।
अटव्यां च सुघोरायां तृष्णार्तो नष्टचेतनः । सरः सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिर्वृतम् ॥ २० ॥ उस घोर वनमें प्याससे पीड़ित एवं अचेत-सा होकर मैंने एक सरोवर देखा, जो पक्षियोंसे घिरा हुआ और मनोहर शोभासे सम्पन्न था ॥ २० ॥
तत्रावगाढः स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृतः पुरा । नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा ॥ २१ ॥ आह पुत्रांस्ततः सोऽथ स्त्रीभूतः पार्थिवोत्तमः । सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रकाः ॥ २२ ॥ उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया। अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम-गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा—'पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक रहकर राज्यका उपभोग करो। अब मैं वनको चला जाऊँगा' ॥ २१-२२ ॥
एवमुक्त्वा पुत्रशतं वनमेव जगाम ह । गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत ॥ २३ ॥ अपने सौ पुत्रोंसे ऐसा कहकर राजा वनको चले गये। वह स्त्री किसी आश्रममें जाकर एक तापसके आश्रयमें रहने लगी ॥ २३ ॥
तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् । अथ साऽऽदाय तान् सर्वान् पूर्वपुत्रानभाषत ॥ २४ ॥ पुरुषत्वे सुता यूयं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः । एकत्र भुज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः ॥ २५ ॥ उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए। तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंके पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली—'पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं। तुम सब लोग एकत्र होकर साथ-साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो' ॥ २४-२५ ॥
सहिता भ्रातरस्तेऽथ राज्यं बुभुजिरे तदा । तान् दृष्ट्वा भ्रातृभावेन भुञ्जानान् राज्यमुत्तमम् ॥ २६ ॥ चिन्तयामास देवेन्द्रो मन्युनाथ परिप्लुतः । उपकारोऽस्य राजर्षेः कृतो नापकृतं मया ॥ २७ ॥ तब वे सब भाई एक साथ होकर उस राज्यका उपभोग करने लगे। उन सबको भ्रातृभावसे एक साथ रहकर उस उत्तम राज्यका उपभोग करते देख क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षिका उपकार ही कर दिया, अपकार तो कुछ किया ही नहीं ॥ २६-२७ ॥
ततो ब्राह्मणरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।
भेदयामास तान् गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् ॥ २८ ॥
तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी ॥ २८ ॥
भ्रातॄणां नास्ति सौभ्रात्रं येष्वेकस्य पितुः सुताः ।
राज्यहेतोर्विवदिताः कश्यपस्य सुरासुराः ॥ २९ ॥
वे बोले—‘राजकुमारो! जो एक पिताके पुत्र हैं, ऐसे भाइयोंमें भी प्रायः उत्तम भ्रातृप्रेम नहीं रहता। देवता और असुर दोनों ही कश्यपजीके पुत्र हैं तथापि राज्यके लिये परस्पर विवाद करते रहते हैं’ ॥ २९ ॥
यूयं भङ्गास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुताः ।
कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा ॥ ३० ॥
‘तुमलोग तो भङ्गास्वनके पुत्र हो और दूसरे सौ भाई एक तापसके लड़के हैं। फिर तुममें प्रेम कैसे रह सकता है? देवता और असुर तो कश्यपके ही पुत्र हैं, फिर भी उनमें प्रेम नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥
युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजैः ।
इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेऽन्योन्यमपातयन् ॥ ३१ ॥
‘तुमलोगोंका जो पैतृक राज्य है, उसे तापसके लड़के आकर भोग रहे हैं।’ इस प्रकार इन्द्रके द्वारा फूट डालनेपर वे आपसमें लड़ पड़े। उन्होंने युद्धमें एक-दूसरेको मार गिराया ॥ ३१ ॥
तच्छ्रुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह ।
ब्राह्मणच्छद्मनाभ्येत्य तामिन्द्रोऽथान्वपृच्छत ॥ ३२ ॥
यह समाचार सुनकर तापसीको बड़ा दुःख हुआ। वह फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय ब्राह्मणका वेश धारण करके इन्द्र उसके पास आये और पूछने लगे— ॥ ३२ ॥
केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने ।
ब्राह्मणं तं ततो दृष्ट्वा सा स्त्री करुणमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
‘सुमुखि! तुम किस दुःखसे संतप्त होकर रो रही हो?’ उस ब्राह्मणको देखकर वह स्त्री करुणस्वरमें बोली— ॥ ३३ ॥
पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन् कालेन विनिपातिते ।
अहं राजाभवं विप्र तत्र पूर्वं शतं मम ॥ ३४ ॥
समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम ।
कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने ॥ ३५ ॥
‘ब्रह्मन्! मेरे दो सौ पुत्र कालके द्वारा मारे गये। विप्रवर! मैं पहले राजा था। तब मेरे सौ पुत्र हुए थे। द्विजश्रेष्ठ! वे सभी मेरे अनुरूप थे। एक दिन मैं शिकार खेलनेके लिये गहन वनमें गया और वहाँ अकारण भ्रमित-सा होकर इधर-उधर भटकने लगा ॥ ३४-३५ ॥