भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 130

अटव्यां च सुघोरायां तृष्णार्तो नष्टचेतनः । सरः सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिर्वृतम् ॥ २० ॥ उस घोर वनमें प्याससे पीड़ित एवं अचेत-सा होकर मैंने एक सरोवर देखा, जो पक्षियोंसे घिरा हुआ और मनोहर शोभासे सम्पन्न था ॥ २० ॥

तत्रावगाढः स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृतः पुरा । नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा ॥ २१ ॥ आह पुत्रांस्ततः सोऽथ स्त्रीभूतः पार्थिवोत्तमः । सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रकाः ॥ २२ ॥ उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया। अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम-गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा—'पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक रहकर राज्यका उपभोग करो। अब मैं वनको चला जाऊँगा' ॥ २१-२२ ॥

एवमुक्त्वा पुत्रशतं वनमेव जगाम ह । गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत ॥ २३ ॥ अपने सौ पुत्रोंसे ऐसा कहकर राजा वनको चले गये। वह स्त्री किसी आश्रममें जाकर एक तापसके आश्रयमें रहने लगी ॥ २३ ॥

तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् । अथ साऽऽदाय तान् सर्वान् पूर्वपुत्रानभाषत ॥ २४ ॥ पुरुषत्वे सुता यूयं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः । एकत्र भुज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः ॥ २५ ॥ उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए। तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंके पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली—'पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं। तुम सब लोग एकत्र होकर साथ-साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो' ॥ २४-२५ ॥

सहिता भ्रातरस्तेऽथ राज्यं बुभुजिरे तदा । तान् दृष्ट्वा भ्रातृभावेन भुञ्जानान् राज्यमुत्तमम् ॥ २६ ॥ चिन्तयामास देवेन्द्रो मन्युनाथ परिप्लुतः । उपकारोऽस्य राजर्षेः कृतो नापकृतं मया ॥ २७ ॥ तब वे सब भाई एक साथ होकर उस राज्यका उपभोग करने लगे। उन सबको भ्रातृभावसे एक साथ रहकर उस उत्तम राज्यका उपभोग करते देख क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षिका उपकार ही कर दिया, अपकार तो कुछ किया ही नहीं ॥ २६-२७ ॥

ततो ब्राह्मणरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।