महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनेको स्त्रीरूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। उनके सारे अन्तःकरणमें भारी चिन्ता व्याप्त हो गयी। उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल हो उठीं।। आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम्। इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम् ।। १२ ।। जातं महाबलानां मे तान् प्रवक्ष्यामि किं त्वहम् । दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च ।। १३ ।। वे स्त्रीरूपमें इस प्रकार सोचने लगे—अब मैं कैसे घोड़ेपर चढूँगी? कैसे नगरको जाऊँगी? मेरे अग्निष्टुत यज्ञके अनुष्ठानसे मुझे सौ महाबलवान् औरस पुत्र प्राप्त हुए हैं। उन सबसे क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों तथा नगर और जनपदके लोगोंमें कैसे जाऊँगी? ।। १२-१३ ।।
मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च। स्त्रीगुणा ऋषिभिः प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः ।। १४ ।। ‘धर्मके तत्त्वको देखने और जाननेवाले ऋषियोंने मृदुता, कृशता और व्याकुलता—ये स्त्रीके गुण बताये हैं ।। १४ ।।
व्यायामे कर्कशत्वं च वीर्यं च पुरुषे गुणाः। पौरुषं विप्रणष्टं वै स्त्रीत्वं केनापि मेऽभवत् ।। १५ ।। ‘परिश्रम करनेमें कठोरता और बल-पराक्रम—ये पुरुषके गुण हैं। मेरा पौरुष नष्ट हो गया और किसी अज्ञात कारणसे मुझमें स्त्रीत्व प्रकट हो गया ।। १५ ।।
स्त्रीभावात् पुनरश्वं तं कथमारोढुमुत्सहे । महता त्वथ यत्नेन आरुह्याश्वं नराधिपः ।। १६ ।। पुनरायात् पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तमः । ‘अब स्त्रीभाव आ जानेसे उस अश्वपर कैसे चढ़ सकूँगी?’ तात! किसी-किसी तरह महान् प्रयत्न करके वे स्त्रीरूपधारी नरेश घोड़ेपर चढ़कर अपने नगरमें आये ।। १६ १/२ ।।
पुत्र दारांश्च भृत्यांश्च पौरजानपदांश्च ते ।। १७ ।। किंस्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गताः । राजाके पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक तथा नगर और जनपदके लोग, ‘यह क्या हुआ?’—ऐसी जिज्ञासा करते हुए बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ।। १७ १/२ ।।
अथोवाच स राजर्षिः स्त्रीभूतो वदतां वरः ।। १८ ।। मृगयामस्मि निर्यातो बलैः परिवृतो दृढम् । उद्भ्रान्तः प्राविशं घोरमटवीं दैवचोदितः ।। १९ ।। तब स्त्रीरूपधारी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजर्षि भंगास्वन बोले—‘मैं अपनी सेनासे घिरकर शिकार खेलनेके लिये निकला था; परंतु दैवकी प्रेरणासे भ्रान्तचित्त होकर एक भयानक वनमें जा घुसा ।। १८-१९ ।।