महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुषसिंह! पहलेकी बात है, भंगास्वन नामसे प्रसिद्ध अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि पुत्रहीन
होनेके कारण पुत्र-प्राप्तिके लिये यज्ञ करते थे ।। ३ ।।
अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबलः ।
प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते ॥ ४ ॥
उन महाबली राजर्षिने अग्निष्टुत नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें इन्द्रकी
प्रधानता न होनेके कारण इन्द्र उस यज्ञसे द्वेष रखते हैं। वह यज्ञ मनुष्योंके प्रायश्चित्तके
अवसरपर अथवा पुत्रकी कामना होनेपर अभीष्ट मानकर किया जाता है ॥ ४ ।।
इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः ।
अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मनः ॥ ५ ॥
महाभाग देवराज इन्द्रको जब उस यज्ञकी बात मालूम हुई तब वे मनको वशमें
रखनेवाले राजर्षि भंगास्वनका छिद्र ढूँढ़ने लगे ।। ५ ।।
न चैवास्यान्तरं राजन् स ददर्श महात्मनः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य मृगयां गतवान् नृपः ।। ६ ।।
राजन्! बहुत ढूँढ़नेपर भी वे उस महामना नरेशका कोई छिद्र न देख सके। कुछ
कालके अनन्तर राजा भंगास्वन शिकार खेलनेके लिये वनमें गये ।। ६ ।।
इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत् ।
एकाश्वेन च राजर्षिर्भ्रान्त इन्द्रेण मोहितः ॥ ७ ॥
न दिशोऽविन्दत नृपः क्षुत्पिपासार्दितस्तदा ।
इतश्चेतश्च वै राजन् श्रमकृष्णाान्वितो नृप ।। ८ ।।
नरेश्वर! 'यही बदला लेनेका अवसर है' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने राजाको मोहमें डाल
दिया। इन्द्रद्वारा मोहित एवं भ्रान्त हुए राजर्षि भंगास्वन एकमात्र घोड़ेके साथ इधर-उधर
भटकने लगे। उन्हें दिशाओंका भी पता नहीं चलता था। वे भूख-प्याससे पीड़ित तथा
परिश्रम और तृष्णासे विकल हो इधर-उधर घूमते रहे ॥ ७-८ ।।
सरोऽपश्यत् सुरुचिरं पूर्णं परमवारिणा ।
सोऽवगाह्य सरस्तात पाययामास वाजिनम् ॥ ९ ॥
तात! घूमते-घूमते उन्होंने उत्तम जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा। उन्होंने
घोड़ेको उस सरोवरमें स्नान कराकर पानी पिलाया ।। ९ ।।
अथ पीतोदकं सोऽश्वं वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तमः ।
अवगाह्य ततः स्नातस्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान् ॥ १० ॥
जब घोड़ा पानी पी चुका तब उसे एक वृक्षमें बाँधकर वे श्रेष्ठ नरेश स्वयं भी जलमें
उतरे। उसमें स्नान करते ही वे राजा स्त्रीभावको प्राप्त हो गये ।। १० ।।
आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्ट्वा व्रीडितो नृपसत्तमः ।
चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतनः ॥ ११ ॥