महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनासक्त चित्तसे मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर प्रायश्चित्त करनेकी इच्छासे अपने शरीरको त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये। इसी समय धर्मने आकर उन धर्मज्ञ, धर्मात्मा वत्सनाभका हाथ पकड़ लिया ।।
धर्म उवाच
वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुषः ।
परितुष्टोऽस्मि त्यागेन निःसङ्गेन तथाऽऽत्मनः ।।
**धर्मने कहा—**महाप्राज्ञ वत्सनाभ! तुम्हारी आयु कई सौ वर्षोंकी है। तुम्हारे इस आसक्तिरहित आत्मत्यागके विचारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।।
एवं धर्मभृतः सर्वे विमृशन्ति तथा कृतम् ।
न स कश्चिद् वत्सनाभ यस्य नोपहतं मनः ।।
यश्चानवद्यश्चरति शक्तो धर्मं तु सर्वशः ।
निवर्तस्व महाप्राज्ञ भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ॥)
इसी प्रकार सभी धर्मात्मा पुरुष अपने किये हुए कर्मकी आलोचना करते हैं। वत्सनाभ! जगत्में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जिसका मन कभी दूषित न हुआ हो। जो मनुष्य निन्द्य कर्मोंसे दूर रहकर सब तरहसे धर्मका आचरण करता है वही शक्तिशाली है। महाप्राज्ञ! अब तुम प्राणत्यागके संकल्पसे निवृत्त हो जाओ, क्योंकि तुम सनातन (अजर-अमर) आत्मा हो ।।
युधिष्ठिर उवाच
स्त्रीपुंसयोः सम्प्रयोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् ।
एतस्मिन् संशये राजन् यथावद् वक्तुमर्हसि ।। १ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है (स्त्रीको या पुरुषको)? इस संशयके विषयमें आप यथावत्रूपसे बतानेकी कृपा करें ।। १ ।।
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत् पुरा ।। २ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें भी भंगास्वनके साथ इन्द्रका पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। २ ।।
पुरा भंगास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिकः ।
अपुत्रः पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थं यज्ञमाहरत् ।। ३ ।।