भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 126

जलाशयान् स तान् दृष्ट्वा विप्रः प्रमुदितोऽभवत् ।।
तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ।।
अचिन्तयद् विस्मितश्च वर्षात् केनाभिरक्षितः ।
ततोऽपश्यत् तं महिषमवस्थितमदूरतः ।।
फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि ‘इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है। इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ।।
तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सलः ।
अतो नु भद्रं महिषः शिलापट्ट इव स्थितः ।
पीवरश्चैव शूल्यश्च बहुमांसो भवेदयम् ।।
‘अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था। इसीलिये मेरा भला हुआ है। यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है’ ।।
तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुनेः ।
कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिनः ।।
तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।।
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन ।
ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ।।
‘मैं प्राण-त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता। धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ।।
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् ।
कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृतिः ।।
‘पिता-माताका भरण-पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्चित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ।।
आकाङ्क्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् ।
तस्मात् प्राणान् परित्यक्ष्ये प्रायश्चित्तार्थमित्युत ।।
‘अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा। अतः मैं प्रायश्चित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा’ ।।
स मेरुशिखरं गत्वा निस्सङ्गेनान्तरात्मना ।
प्रायश्चित्तं कर्तुकामः शरीरं त्यक्तुमुद्यतः ।।
निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ।।