महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभेदयामास तान् गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् ॥ २८ ॥
तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी ॥ २८ ॥
भ्रातॄणां नास्ति सौभ्रात्रं येष्वेकस्य पितुः सुताः ।
राज्यहेतोर्विवदिताः कश्यपस्य सुरासुराः ॥ २९ ॥
वे बोले—‘राजकुमारो! जो एक पिताके पुत्र हैं, ऐसे भाइयोंमें भी प्रायः उत्तम भ्रातृप्रेम नहीं रहता। देवता और असुर दोनों ही कश्यपजीके पुत्र हैं तथापि राज्यके लिये परस्पर विवाद करते रहते हैं’ ॥ २९ ॥
यूयं भङ्गास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुताः ।
कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा ॥ ३० ॥
‘तुमलोग तो भङ्गास्वनके पुत्र हो और दूसरे सौ भाई एक तापसके लड़के हैं। फिर तुममें प्रेम कैसे रह सकता है? देवता और असुर तो कश्यपके ही पुत्र हैं, फिर भी उनमें प्रेम नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥
युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजैः ।
इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेऽन्योन्यमपातयन् ॥ ३१ ॥
‘तुमलोगोंका जो पैतृक राज्य है, उसे तापसके लड़के आकर भोग रहे हैं।’ इस प्रकार इन्द्रके द्वारा फूट डालनेपर वे आपसमें लड़ पड़े। उन्होंने युद्धमें एक-दूसरेको मार गिराया ॥ ३१ ॥
तच्छ्रुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह ।
ब्राह्मणच्छद्मनाभ्येत्य तामिन्द्रोऽथान्वपृच्छत ॥ ३२ ॥
यह समाचार सुनकर तापसीको बड़ा दुःख हुआ। वह फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय ब्राह्मणका वेश धारण करके इन्द्र उसके पास आये और पूछने लगे— ॥ ३२ ॥
केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने ।
ब्राह्मणं तं ततो दृष्ट्वा सा स्त्री करुणमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
‘सुमुखि! तुम किस दुःखसे संतप्त होकर रो रही हो?’ उस ब्राह्मणको देखकर वह स्त्री करुणस्वरमें बोली— ॥ ३३ ॥
पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन् कालेन विनिपातिते ।
अहं राजाभवं विप्र तत्र पूर्वं शतं मम ॥ ३४ ॥
समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम ।
कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने ॥ ३५ ॥
‘ब्रह्मन्! मेरे दो सौ पुत्र कालके द्वारा मारे गये। विप्रवर! मैं पहले राजा था। तब मेरे सौ पुत्र हुए थे। द्विजश्रेष्ठ! वे सभी मेरे अनुरूप थे। एक दिन मैं शिकार खेलनेके लिये गहन वनमें गया और वहाँ अकारण भ्रमित-सा होकर इधर-उधर भटकने लगा ॥ ३४-३५ ॥