महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् । पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ॥ ६१ ॥ आपकी उग्र तपस्या थी, वह मुझे उपदेश देनेके कारण नष्ट हो गयी। अतः आप पुरोहितका काम छोड़कर पुनः संसार-सागरसे पार होनेके लिये प्रयत्न कीजिये ॥ ६१ ॥
इतस्त्वमधमामन्यां मा योनिं प्राप्स्यसे द्विज । गृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम ॥ ६२ ॥ ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कहीं ऐसा न हो कि आप इसके बाद दूसरी किसी नीच योनिमें पड़ जायँ। अतः विप्रवर! जितना चाहिये धन ले लीजिये और अपने अन्तःकरणको पवित्र बनानेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६२ ॥
भीष्म उवाच
ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्यनेकशः । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्च सर्वशः ॥ ६३ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर राजासे विदा लेकर पुरोहितने बहुत-से ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। धन, भूमि और ग्राम भी वितरण किये ॥ ६३ ॥
कृच्छ्राणि चीर्त्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमैः । तीर्थानि चापि गत्वा वै दानानि विविधानि च ॥ ६४ ॥ उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके बताये अनुसार उन्होंने अनेक प्रकारके कृच्छ्रव्रत किये और तीर्थोंमें जाकर नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान कीं ॥ ६४ ॥
दत्त्वा गाश्चैव विप्रेभ्यः पूतात्माभवदात्मवान् । तमेव चाश्रमं गत्वा चचार विपुलं तपः ॥ ६५ ॥ ब्राह्मणोंको गोदान करके पवित्रात्मा होकर उन मनस्वी ब्राह्मणने फिर उसी आश्रमपर जाकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ६५ ॥
ततः सिद्धिं परां प्राप्तो ब्राह्मणो राजसत्तम । सम्मतश्चाभवत् तेषामाश्रमे तन्निवासिनाम् ॥ ६६ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर परम सिद्धिको प्राप्त होकर वे ब्राह्मण देवता उस आश्रममें रहनेवाले समस्त साधकोंके लिये सम्माननीय हो गये ॥ ६६ ॥
एवं प्राप्तो महत्कृच्छ्रमृषिः सन्नृपसत्तम । ब्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद् वर्णावरे जने ॥ ६७ ॥ नृपशिरोमणे! इस प्रकार वे ऋषि शूद्रको उपदेश देनेके कारण महान् कष्टमें पड़ गये; इसलिये ब्राह्मणको चाहिये कि वह नीच वर्णके मनुष्यको उपदेश न दे ॥ ६७ ॥
(वर्जयेदुपदेशं च सदैव ब्राह्मणो नृप । उपदेशं हि कुर्वाणो द्विजः कृच्छ्रमवाप्नुयात् ।