भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 114

**राजाने कहा—**विप्रवर! आपके इस प्रकार पूछनेपर तो यदि कोई न कहने योग्य बात हो तो उसे भी अवश्य ही कह देना चाहिये। अतः आप मन लगाकर सुनिये॥ ५३॥

पूर्वदेहे यथा वृत्तं तन्निबोध द्विजोत्तम।
जातिं स्मराम्यहं ब्रह्मन्नवधानेन मे शृणु॥ ५४॥
द्विजश्रेष्ठ! जब हमने पूर्वजन्ममें शरीर धारण किया था, उस समय जो घटना घटित हुई थी, उसे सुनिये। ब्रह्मन्! मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है। आप ध्यान देकर मेरी बात सुनिये॥ ५४॥

शूद्रोऽहमभवं पूर्वं तापसो भृशसंयुतः।
ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाभूद् द्विजसत्तम॥ ५५॥
विप्रवर! पहले जन्ममें मैं शूद्र था। फिर बड़ा भारी तपस्वी हो गया। उन्हीं दिनों आप उग्र तप करनेवाले श्रेष्ठ महर्षि थे॥ ५५॥

प्रीयता हि तदा ब्रह्मन् ममानुग्रहबुद्धिना।
पितृकार्ये त्वया पूर्वमुपदेशः कृतोऽनघ॥ ५६॥
निष्पाप ब्रह्मन्! उन दिनों आप मुझसे बड़ा प्रेम रखते थे; अतः मेरे ऊपर अनुग्रह करनेके विचारसे आपने पितृकार्यमें मुझे आवश्यक विधिका उपदेश किया था॥ ५६॥

बृस्यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम।
एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजायथाः॥ ५७॥
मुनिश्रेष्ठ! कुशके चट कैसे रखे जायँ? कुशा कैसे बिछायी जाय? हव्य और कव्य कैसे समर्पित किये जायँ? इन्हीं सब बातोंका आपने मुझे उपदेश दिया था। इसी कर्मदोषके कारण आपको इस जन्ममें पुरोहित होना पड़ा॥ ५७॥

अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम्।
मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयावाप्तमिदं फलम्॥ ५८॥
विप्रेन्द्र! यह कालका उलट-फेर तो देखिये कि मैं तो शूद्रसे राजा हो गया और मुझे ही उपदेश करनेके कारण आपको यह फल मिला॥ ५८॥

एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मन् प्रहसे त्वां द्विजोत्तम।
न त्वां परिभवन् ब्रह्मन् प्रहसामि गुरुर्भवान्॥ ५९॥
द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैं आपकी ओर देखकर हँसता हूँ। आपका अनादर करनेके लिये मैं आपकी हँसी नहीं उड़ाता हूँ; क्योंकि आप मेरे गुरु हैं॥

विपर्ययेण मे मन्युस्तेन संतप्यते मनः।
जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै॥ ६०॥
यह जो उलट-फेर हुआ है, इससे मुझको बड़ा खेद है और इसीसे मेरा मन संतप्त रहता है। मैं अपनी और आपकी भी पूर्वजन्मकी बातोंको याद करता हूँ; इसीलिये आपकी ओर देखकर हँस देता हूँ॥ ६०॥