महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी शूद्रको उपदेश न दे; क्योंकि उपदेश करनेवाला ब्राह्मण स्वयं ही संकटमें पड़ जाता है ॥ नेषितव्यं सदा वाचा द्विजेन नृपसत्तम । न च प्रवक्तव्यमिह किंचिद् वर्णावरे जने ॥) नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणको अपनी वाणीद्वारा कभी उपदेश देनेकी इच्छा ही नहीं करनी चाहिये। यदि करे भी तो नीच वर्णके पुरुषको तो कदापि कुछ उपदेश न दे ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः । एतेषु कथयन् राजन् ब्राह्मणो न प्रदुष्यति ॥ ६८ ॥ राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं। इन्हें उपदेश देनेवाला ब्राह्मण दोषका भागी नहीं होता है ॥ ६८ ॥ तस्मात् सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित् किंचिदग्रतः । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्यकृतात्मभिः ॥ ६९ ॥ इसलिये सत्पुरुषोंको कभी किसीके सामने कोई उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है। जिन्होंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध एवं वशीभूत नहीं कर लिया है, उनके लिये धर्मकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है ॥ ६९ ॥ तस्मान्मौनेन मुनयो दीक्षां कुर्वन्ति चादृताः । दुरुक्तस्य भयाद् राजन् नाभाषन्ते च किंचन ॥ ७० ॥ राजन्! इसीलिये ऋषि-मुनि मौनभावसे ही आदरपूर्वक दीक्षा देते हैं। कोई अनुचित बात मुँहसे न निकल जाय, इसीके भयसे वे कोई भाषण नहीं देते हैं ॥ धार्मिका गुणसम्पन्नाः सत्यार्जवसमन्विताः । दुरुक्तवाचाभिहितैः प्राप्नुवन्तीह दुष्कृतम् ॥ ७१ ॥ धार्मिक, गुणवान् तथा सत्य-सरलता आदि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष भी शास्त्रविरुद्ध अनुचित वचन कह देनेके कारण यहाँ दुष्कर्मके भागी हो जाते हैं ॥ ७१ ॥ उपदेशो न कर्तव्यः कदाचिदपि कस्यचित् । उपदेशाद्धि तत् पापं ब्राह्मणः समवाप्नुयात् ॥ ७२ ॥ ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी किसीको उपदेश न करे; क्योंकि उपदेश करनेसे वह शिष्यके पापको स्वयं ग्रहण करता है ॥ ७२ ॥ विमृश्य तस्मात् प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता । सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि ॥ ७३ ॥ अतः धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् पुरुषको बहुत सोच-विचारकर बोलना चाहिये; क्योंकि साँच और झूठमिश्रित वाणीसे किया गया उपदेश हानिकारक होता है ॥ ७३ ॥ वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्चित्य विनिश्चयम् ।