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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय और जबतक वह रहे उसके स्वागत-सत्कारमें लगा रहे—ये पाँच काम करना गृहस्थके लिये पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ कहलाता है॥ ६॥ यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।
श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ ७॥
जो थके-माँदे अपरिचित पथिकको प्रसन्नतापूर्वक अन्न दान करता है, उसे महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है॥ ७॥
स्थण्डिलेषु शयानानां गृहाणि शयनानि च।
चीरवल्कलसंवीते वासांस्याभरणानि च॥ ८॥
जो वानप्रस्थी वेदीपर शयन करते हैं उन्हें जन्मान्तरमें उत्तम गृह और शय्याकी प्राप्ति होती है। जो चीर और वल्कल वस्त्र पहनते हैं उन्हें दूसरे जन्ममें उत्तम वस्त्र और उत्तम आभूषणोंकी प्राप्ति होती है॥ ८॥
वाहनानि च यानानि योगात्मनि तपोधने।
अग्नीनुपशयानस्य राज्ञः पौरुषमेव च॥ ९॥
जिसका चित्त योगयुक्त होता है उस तपोधन पुरुषको दूसरे जन्ममें अच्छे-अच्छे वाहन और यान उपलब्ध होते हैं तथा अग्निकी उपासना करनेवाले राजाको जन्मान्तरमें पौरुषकी प्राप्ति होती है॥ ९॥
रसानां प्रतिसंहारे सौभाग्यमनुगच्छति।
आमिषप्रतिसंहारे पशून् पुत्रांश्च विन्दति॥ १०॥
रसोंका परित्याग करनेसे सौभाग्यकी और मांसका त्याग करनेसे पशुओं तथा पुत्रोंकी प्राप्ति होती है॥ १०॥
अवाक्शिरास्तु यो लम्बेदुदवासं च यो वसेत्।
सततं चैकशायी यः स लभेतेप्सितां गतिम्॥ ११॥
जो तपस्वी नीचे सिर करके लटकता है अथवा जलमें निवास करता है; तथा जो सदा ही अकेला सोता (ब्रह्मचर्यका पालन करता) है, वह मनोवांछित गतिको प्राप्त होता है॥ ११॥
पाद्यमासनमेवाथ दीपमन्नं प्रतिश्रयम्।
दद्यादतिथिपूजार्थं स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ १२॥
जो अतिथिको पैर धोनेके लिये जल, बैठनेके लिये आसन, प्रकाशके लिये दीपक, खानेके लिये अन्न और ठहरनेके लिये घर देता है, इस प्रकार अतिथिका सत्कार करनेके लिये इन पाँच वस्तुओंका दान ‘पंचदक्षिण यज्ञ’ कहलाता है॥ १२॥
वीरासनं वीरशय्यां वीरस्थानमुपागतः।
अक्षयास्तस्य वै लोकाः सर्वकामगमास्तथा॥ १३॥

जो वीरासन रणभूमिमें जाकर वीरशय्या (मृत्यु)-को प्राप्त हो वीरस्थान (स्वर्गलोक) में जाता है, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है। वे लोक सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं ॥ १३ ॥

धनं लभेत दानेन मौनेनाज्ञां विशाम्पते । उपभोगांश्च तपसा ब्रह्मचर्येण जीवितम् ॥ १४ ॥ प्रजानाथ! मनुष्य दानसे धन पाता है, मौन-व्रतके पालनसे दूसरोंद्वारा आज्ञापालन करानेकी शक्ति प्राप्त करता है, तपस्यासे भोग और ब्रह्मचर्य-पालनसे जीवन (आयु)-की उपलब्धि होती है ॥ १४ ॥

रूपमैश्वर्यमारोग्यमहिंसाफलमश्नुते । फलमूलाशनो राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ॥ १५ ॥ अहिंसा धर्मके आचरणसे रूप, ऐश्वर्य और आरोग्यरूपी फलकी प्राप्ति होती है। फल-मूल खानेवालेको राज्य और पत्ते चबाकर रहनेवालेको स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥

प्रायोपवेशिनो राजन् सर्वत्र सुखमुच्यते । गवाढ्यः शाकदीक्षायां स्वर्गगामी तृणाशनः ॥ १६ ॥ राजन्! जो आमरण अनशनका व्रत लेकर बैठता है उसके लिये सर्वत्र सुख बताया गया है। शाकाहारकी दीक्षा लेनेपर गोधनकी प्राप्ति होती है और तृण खाकर रहनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १६ ॥

स्त्रियस्त्रिषवणं स्नात्वा वायुं पीत्वा क्रतुं लभेत् । स्वर्गं सत्येन लभते दीक्षया कुलमुत्तमम् ॥ १७ ॥ स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग करके त्रिकाल स्नान करते हुए वायु पीकर रहनेसे यज्ञका फल प्राप्त होता है। सत्यसे मनुष्य स्वर्गको और दीक्षासे उत्तम कुलको पाता है ॥ १७ ॥

सलिलाशी भवेद् यस्तु सदाग्निः संस्कृतो द्विजः । मनुं साधयतो राज्यं नाकपृष्ठमनाशके ॥ १८ ॥ जो ब्राह्मण सदा जल पीकर रहता है, अग्निहोत्र करता है और मन्त्र-साधनामें संलग्न रहता है, उसे राज्य मिलता है और निराहारव्रत करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १८ ॥

उपवासं च दीक्षायामभिषेकं च पार्थिव । कृत्वा द्वादश वर्षाणि वीरस्थानाद् विशिष्यते ॥ १९ ॥ पृथ्वीनाथ! जो पुरुष बारह वर्षोंतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेकर अन्नका त्याग करता और तीर्थोंमें स्नान करता रहता है, उसे रणभूमिमें प्राण त्यागनेवाले वीरसे भी बढ़कर उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ॥ १९ ॥

अधीत्य सर्ववेदान् वै सद्यो दुःखद् विमुच्यते ।

मानसं हि चरन् धर्मं स्वर्गलोकमुपाश्नुते ॥ २० ॥ जो सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर लेता है, वह तत्काल दुःखसे मुक्त हो जाता है तथा जो मनसे धर्मका आचरण करता है, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ २० ॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ २१ ॥ खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंके लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्यके जीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणनाशक रोगके समान सदा कष्ट देती रहती है, उस तृष्णाका त्याग कर देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है ॥ २१ ॥

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् । एवं पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥ २२ ॥ जैसे बछड़ा हजारों गौओंके बीचमें अपनी माताको ढूँढ लेता है, उसी प्रकार पहलेका किया हुआ कर्म भी कर्ताको पहचानकर उसका अनुसरण करता है ॥ २२ ॥

अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च । स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम् ॥ २३ ॥ जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणा न होनेपर भी अपने समयका उल्लंघन नहीं करते—ठीक समयपर फूलने-फलने लग जाते हैं, वैसे ही पहलेका किया हुआ कर्म भी समयपर फल देता ही है ॥ २३ ॥

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः । चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते ॥ २४ ॥ मनुष्यके जीर्ण (जराग्रस्त) होनेपर उसके केश जीर्ण होकर झड़ जाते हैं, वृद्ध पुरुषके दाँत भी टूट जाते हैं, नेत्र और कान भी जीर्ण होकर अन्धे-बहरे हो जाते हैं। केवल तृष्णा ही जीर्ण नहीं होती है (वह सदा नयी-नवेली बनी रहती है) ॥ २४ ॥

येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीतः प्रजापतिः । प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता ॥ २५ ॥ येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम् । मनुष्य जिस व्यवहारसे पिताको प्रसन्न करता है, उससे भगवान् प्रजापति प्रसन्न होते हैं। जिस बर्तावसे वह माताको सन्तुष्ट करता है, उससे पृथिवी देवीकी भी पूजा हो जाती है तथा जिससे वह उपाध्यायको तृप्त करता है, उसके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी पूजा सम्पन्न हो जाती है ॥ २५ १/२ ॥

सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः । अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥ २६ ॥ जिसने इन तीनोंका आदर किया, उसके द्वारा सभी धर्मोंका आदर हो गया और जिसने इन तीनोंका अनादर कर दिया, उसकी सम्पूर्ण यज्ञादिक क्रियाएँ निष्फल हो जाती

हैं ।। २६ ।।

वैशम्पायन उवाच

भीष्मस्यैतद् वचःश्रुत्वा विस्मिताः कुरुपुङ्गवाः ।
आसन् प्रहृष्टमनसः प्रीतिमन्तोऽभवंस्तदा ॥ २७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ कुरुवंशी आश्चर्यचकित हो उठे। सबके मनमें हर्षजनित उल्लास भर गया। उस समय सभी बड़े प्रसन्न हुए ।। २७ ।।

भीष्म उवाच

यन्मन्त्रे भवति वृथोपयुज्यमाने
यत् सोमे भवति वृथाभिषूयमाणे ।
यच्चाग्नौ भवति वृथाभिहूयमाने
तत् सर्वं भवति वृथाभिधीयमाने ॥ २८ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वेदमन्त्रोंका व्यर्थ (अशुद्ध) उपयोग (उच्चारण) करनेपर जो पाप लगता है, सोमयागको दक्षिणा आदि न देनेके कारण व्यर्थ कर देनेपर जो दोष लगता है तथा विधि और मन्त्रके बिना अग्निमें निरर्थक आहुति देनेपर जो पाप होता है; वह सारा पाप मिथ्या भाषण करनेसे प्राप्त होता है ।। २८ ।।

इत्येतदृषिणा प्रोक्तमुक्तवानस्मि यद् विभो ।
शुभाशुभफलप्राप्तौ किमतः श्रोतुमिच्छसि ॥ २९ ॥
राजन्! शुभ और अशुभ फलकी प्राप्तिके विषयमें महर्षि व्यासने ये सब बातें बतायी थीं, जिन्हें मैंने इस समय तुमसे कहा है। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कर्मफलिकोपाख्याने
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कर्मफलका
उपाख्यानविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७ ।।

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अष्टमोऽध्यायः

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी महिमा

युधिष्ठिर उवाच

के पूज्याः के नमस्कार्याः कान् नमस्यसि भारत ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व येभ्यः स्पृहयसे नृप ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! इस जगत्में कौन-कौन पुरुष पूजन और नमस्कारके योग्य हैं? आप किनको प्रणाम करते हैं? तथा नरेश्वर! आप किनको चाहते हैं? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥

उत्तमापद्गतस्यापि यत्र ते वर्तते मनः ।
मनुष्यलोके सर्वस्मिन् यदमुत्रेह चाप्युत ॥ २ ॥
बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी आपका मन किनका स्मरण किये बिना नहीं रहता? तथा इस समस्त मानवलोक और परलोकमें हितकारक क्या है? ये सब बातें बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

स्पृहयामि द्विजातिभ्यो येषां ब्रह्म परं धनम् ।
येषां स्वप्रत्ययः स्वर्गस्तपः स्वाध्यायसाधनम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! जिनका ब्रह्म (वेद) ही परम धन है, आत्मज्ञान ही स्वर्ग है तथा वेदोंका स्वाध्याय करना ही श्रेष्ठ तप है, उन ब्राह्मणोंको मैं चाहता हूँ ॥ ३ ॥

येषां बालाश्च वृद्धाश्च पितृपैतामहीं धुरम् ।
उद्वहन्ति न सीदन्ति तेभ्यो वै स्पृहयाम्यहम् ॥ ४ ॥
जिनके कुलमें बच्चेसे लेकर बूढ़ेतक बाप-दादोंकी परम्परासे चले आनेवाले धार्मिक कार्यका भार सँभालते हैं; परंतु उसके लिये मनमें कभी खेदका अनुभव नहीं करते हैं; ऐसे ही लोगोंको मैं चाहता हूँ ॥ ४ ॥

विद्यास्वभिविनीतानां दान्तानां मृदुभाषिणाम् ।
श्रुतवृत्तोपपन्नानां सदाक्षरविदां सताम् ॥ ५ ॥
संसत्सु वदतां तात हंसानामिव संघशः ।
मङ्गल्यरूपा रुचिरा दिव्यजीमूतनिःस्वनाः ॥ ६ ॥
सम्यगुच्चरिता वाचः श्रूयन्ते हि युधिष्ठिर ।
शुश्रूषमाणे नृपतौ प्रेत्य चेह सुखावहाः ॥ ७ ॥

जो विनीत भावसे विद्याध्ययन करते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं और मीठे वचन बोलते हैं, जो शास्त्रज्ञान और सदाचार दोनोंसे सम्पन्न हैं, अविनाशी परमात्माको जाननेवाले सत्पुरुष हैं, तात युधिष्ठिर! सभाओंमें बोलते समय हंससमूहोंकी भाँति जिनके मुखसे मेघके समान गम्भीर स्वरसे मनोहर मंगलमयी एवं अच्छे ढंगसे कही गयी बातें सुनायी देती हैं, उन ब्राह्मणोंको ही मैं चाहता हूँ। यदि राजा उन महात्माओंकी बातें सुननेकी इच्छा रखे तो वे उसे इहलोक और परलोकमें भी सुख पहुँचानेवाली होती हैं ।। ५—७ ।। ये चापि तेषां श्रोतारः सदा सदसि सम्मताः । विज्ञानगुणसम्पन्नास्तेभ्यश्च स्पृहयाम्यहम् ।। ८ ।। जो प्रतिदिन उन महात्माओंकी बातें सुनते हैं, वे श्रोता विज्ञानगुणसे सम्पन्न हो सभाओंमें सम्मानित होते हैं। मैं ऐसे श्रोताओंकी भी चाह रखता हूँ ।। ८ ।। सुसंस्कृतानि प्रयताः शुचीनि गुणवन्ति च । ददत्यन्नानि तृप्त्यर्थं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर ।। ९ ।। ये चापि सततं राजंस्तेभ्यश्च स्पृहयाम्यहम् । राजा युधिष्ठिर! जो पवित्र होकर ब्राह्मणोंको उनकी तृप्तिके लिये शुद्ध और अच्छे ढंगसे तैयार किये हुए पवित्र तथा गुणकारक अन्न परोसते हैं, उनको भी मैं सदा चाहता हूँ ।। ९ १/२ ।। शक्यं ह्येवाहवे योद्धुं न दातुमनसूयितम् ।। १० ।। शूरा वीराश्च शतशः सन्ति लोके युधिष्ठिर । येषां संख्यायमानानां दानशूरो विशिष्यते ।। ११ ।। युधिष्ठिर! संग्राममें युद्ध करना सहज है। परंतु दोषदृष्टिसे रहित होकर दान देना सहज नहीं है। संसारमें सैकड़ों शूरवीर हैं; परंतु उनकी गणना करते समय जो उनमें दानशूर हो, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ।। धन्यः स्यां यद्यहं भूयः सौम्य ब्राह्मणकोऽपि वा । कुले जातो धर्मगतिस्तपोविद्यापरायणः ।। १२ ।। सौम्य! यदि मैं कुलीन, धर्मात्मा, तपस्वी और विद्वान् अथवा कैसा भी ब्राह्मण होता तो अपनेको धन्य समझता ।। १२ ।। न मे त्वत्तः प्रियतरो लोकेऽस्मिन् पाण्डुनन्दन । त्वत्तश्चापि प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ ।। १३ ।। पाण्डुनन्दन! इस संसारमें मुझे तुमसे अधिक प्रिय कोई नहीं है; परंतु भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मणोंको मैं तुमसे भी अधिक प्रिय मानता हूँ ।। १३ ।। यथा मम प्रियतमास्त्वत्तो विप्राः कुरूत्तम । तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र स शान्तनुः ।। १४ ।।

कुरुश्रेष्ठ! ‘ब्राह्मण मुझे तुम्हारी अपेक्षा भी बहुत अधिक प्रिय हैं’—इस सत्यके प्रभावसे मैं उन्हीं पुण्यलोकोंमें जाऊँगा जहाँ मेरे पिता महाराज शान्तनु गये हैं ॥ १४ ॥ न मे पिता प्रियतरो ब्राह्मणेभ्यस्तथाभवत् । न मे पितुः पिता वापि ये चान्येऽपि सुहृज्जनाः ॥ १५ ॥ मेरे पिता भी मुझे ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं रहे हैं। पितामह और अन्य सुहृदोंको भी मैंने कभी ब्राह्मणोंसे अधिक प्रिय नहीं समझा है ॥ १५ ॥ न हि मे वृजिनं किंचिद् विद्यते ब्राह्मणेष्विह । अणु वा यदि वा स्थूलं विद्यते साधुकर्मसु ॥ १६ ॥ मेरे द्वारा ब्राह्मणोंके प्रति किन्हीं श्रेष्ठ कर्मोंमें कभी छोटा-मोटा किंचिन्मात्र भी अपराध नहीं हुआ है ॥ १६ ॥ कर्मणा मनसा वापि वाचा वापि परंतप । यन्मे कृतं ब्राह्मणेभ्यस्तेनाद्य न तपाम्यहम् ॥ १७ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मैंने मन, वाणी और कर्मसे ब्राह्मणोंका जो थोड़ा-बहुत उपकार किया है, उसीके प्रभावसे आज इस अवस्थामें पड़ जानेपर भी मुझे पीड़ा नहीं होती है ॥ १७ ॥ ब्रह्मण्य इति मामाहुस्तया वाचास्मि तोषितः । एतदेव पवित्रेभ्यः सर्वेभ्यः परमं स्मृतम् ॥ १८ ॥ लोग मुझे ब्राह्मणभक्त कहते हैं। उनके इस कथनसे मुझे बड़ा संतोष होता है। ब्राह्मणोंकी सेवा ही सम्पूर्ण पवित्र कर्मोंसे बढ़कर परम पवित्र कार्य है ॥ १८ ॥ पश्यामि लोकानमलान् शुचीन् ब्राह्मणयायिनः । तेषु मे तात गन्तव्यमह्नाय च चिराय च ॥ १९ ॥ तात! ब्राह्मणकी सेवामें रहनेवाले पुरुषको जिन पवित्र और निर्मल लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन्हें मैं यहींसे देखता हूँ। अब शीघ्र मुझे चिरकालके लिये उन्हीं लोकोंमें जाना है ॥ १९ ॥ यथा भर्त्राश्रयो धर्मः स्त्रीणां लोके युधिष्ठिर । स देवः सा गतिर्नान्या क्षत्रियस्य तथा द्विजाः ॥ २० ॥ युधिष्ठिर! जैसे स्त्रियोंके लिये पतिकी सेवा ही संसारमें सबसे बड़ा धर्म है, पति ही उनका देवता और वही उनकी परम गति है, उनके लिये दूसरी कोई गति नहीं है; उसी प्रकार क्षत्रियके लिये ब्राह्मणकी सेवा ही परम धर्म है। ब्राह्मण ही उनका देवता और परम गति है, दूसरा नहीं ॥ २० ॥ क्षत्रियः शतवर्षी च दशवर्षी द्विजोत्तमः । पितापुत्रौ च विज्ञेयौ तयोर्हि ब्राह्मणो गुरुः ॥ २१ ॥

क्षत्रिय सौ वर्षका हो और श्रेष्ठ ब्राह्मण दस वर्षकी अवस्थाका हो तो भी उन दोनोंको परस्पर पुत्र और पिताके समान जानना चाहिये। उनमें ब्राह्मण पिता है और क्षत्रिय पुत्र ॥ २१ ॥ नारी तु पत्यभावे वै देवरं कुरुते पतिम् । पृथिवी ब्राह्मणालाभे क्षत्रियं कुरुते पतिम् ॥ २२ ॥ जैसे नारी पतिके अभावमें देवरको पति बनाती है, उसी प्रकार पृथ्वी ब्राह्मणके न मिलनेपर ही क्षत्रियको अपना अधिपति बनाती है ॥ २२ ॥ (ब्राह्मणानुज्ञया ग्राह्यं राज्यं च सपुरोहितैः । तद्रक्षणेन स्वर्गोऽस्य तत्कोपान्नरकोऽक्षयः ॥) पुरोहितसहित राजाओंको ब्राह्मणकी आज्ञासे राज्य ग्रहण करना चाहिये। ब्राह्मणकी रक्षासे ही राजाको स्वर्ग मिलता है और उसको रुष्ट कर देनेसे वह अनन्तकालके लिये नरकमें गिर जाता है ॥ पुत्रवच्च ततो रक्ष्या उपास्या गुरुवच्च ते । अग्निवच्चोपचर्या वै ब्राह्मणाः कुरुसत्तम ॥ २३ ॥ कुरुश्रेष्ठ! ब्राह्मणोंकी पुत्रके समान रक्षा, गुरुकी भाँति उपासना और अग्निकी भाँति उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ २३ ॥ ऋजून् सतः सत्यशीलान् सर्वभूतहिते रतान् । आशीविषानिव क्रुद्धान् द्विजान् परिचरेत् सदा ॥ २४ ॥ (दूरतो मातृवत् पूज्या विप्रदाराः सुरक्षया ।) सरल, साधु, स्वभावतः सत्यवादी तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणोंकी सदा ही सेवा करनी चाहिये और क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान समझकर उनसे भयभीत रहना चाहिये। ब्राह्मणोंकी जो स्त्रियाँ हों उनकी भी सुरक्षाका ध्यान रखते हुए माताके समान उनका दूरसे ही पूजन करना चाहिये ॥ तेजसस्तपसश्चैव नित्यं बिभ्येद् युधिष्ठिर । उभे चैते परित्याज्ये तेजश्चैव तपस्तथा ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंके तेज और तपसे सदा डरना चाहिये तथा उनके सामने अपने तप एवं तेजका अभिमान त्याग देना चाहिये ॥ २५ ॥ व्यवसायस्तयोः शीघ्रमुभयोरेव विद्यते । हन्युः क्रुद्धा महाराज ब्राह्मणा ये तपस्विनः ॥ २६ ॥ महाराज! ब्राह्मणके तप और क्षत्रियके तेजका फल शीघ्र ही प्रकट होता है तथापि जो तपस्वी ब्राह्मण हैं वे कुपित होनेपर तेजस्वी क्षत्रियको अपने तपके प्रभावसे मार सकते हैं ॥ २६ ॥ भूयः स्यादुभयं दत्तं ब्राह्मणाद् यदकोपनात् ।

कुर्यादुभयतः शेषं दत्तशेषं न शेषयेत् ।। २७ ।।

क्रोधरहित—क्षमाशील ब्राह्मणको पाकर क्षत्रियकी ओरसे अधिक मात्रामें प्रयुक्त किये

गये तप और तेज आगपर रूईके ढेरके समान तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यदि दोनों ओरसे

एक-दूसरेपर तेज और तपका प्रयोग हो तो उनका सर्वथा नाश नहीं होता; परंतु क्षमाशील

ब्राह्मणके द्वारा खण्डित होनेसे बचा हुआ क्षत्रियका तेज किसी तेजस्वी ब्राह्मणपर प्रयुक्त

हो तो वह उससे प्रतिहत होकर सर्वथा नष्ट हो जाता है, थोड़ा-सा भी शेष नहीं रह

जाता ।। २७ ।।

दण्डपाणिर्यथा गोषु पालो नित्यं हि रक्षयेत् ।

ब्राह्मणान् ब्रह्म च तथा क्षत्रियः परिपालयेत् ।। २८ ।।

जैसे चरवाहा हाथमें डंडा लेकर सदा गौओंकी रखवाली करता है, उसी प्रकार

क्षत्रियको उचित है कि वह ब्राह्मणों और वेदोंकी सदा रक्षा करे ।। २८ ।।

पितेव पुत्रान् रक्षेथा ब्राह्मणान् धर्मचेतसः ।

गृहे चैषामवेक्षेथाः किंस्विदस्तीति जीवनम् ।। २९ ।।

राजाको चाहिये कि वह धर्मात्मा ब्राह्मणोंकी उसी तरह रक्षा करे, जैसे पिता पुत्रोंकी

करता है। वह सदा इस बातकी देख-भाल करता रहे कि उनके घरमें जीवन-निर्वाहके लिये

क्या है और क्या नहीं है ।। २९ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी

प्रशंसाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/३ श्लोक हैं)

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवमोऽध्यायः

ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मणानां तु ये लोकाः प्रतिश्रुत्य पितामह ।
न प्रयच्छन्ति मोहात् ते के भवन्ति महाद्युते ॥ १ ॥
एतन्मे तत्त्वतो ब्रूहि धर्मं धर्मभृतां वर ।
प्रतिश्रुत्य दुरात्मानो न प्रयच्छन्ति ये नराः ॥ २ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी पितामह! जो लोग ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर मोहवश नहीं देते जो दुरात्मा दानका संकल्प करके भी दान नहीं देते वे क्या होते हैं? यह धर्मका विषय मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

यो न दद्यात् प्रतिश्रुत्य स्वल्पं वा यदि वा बहु ।
आशास्तस्य हताः सर्वाः क्लीबस्येव प्रजाफलम् ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! जो थोड़ा या अधिक देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे नहीं देता है, उसकी सभी आशाएँ वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे नपुंसककी संतानरूपी फलविषयक आशा ॥ ३ ॥

यां रात्रिं जायते जीवो यां रात्रिं च विनश्यति ।
एतस्मिन्नन्तरे यद् यत् सुकृतं तस्य भारत ॥ ४ ॥
यच्च तस्य हुतं किंचिद् दत्तं वा भरतर्षभ ।
तपस्तप्तमथो वापि सर्वं तस्योपहन्यते ॥ ५ ॥

भरतनन्दन! जीव जिस रातको जन्म लेता है और जिस रातको उसकी मौत होती है— इन दोनों रात्रियोंके बीचमें जीवनभर वह जो-जो पुण्यकर्म करता है, भरतश्रेष्ठ! उसने आजीवन जो कुछ होम, दान तथा तप किया होता है, उसका वह सब कुछ उस प्रतिज्ञा-भंगके पापसे नष्ट हो जाता है ॥ ४-५ ॥

अथैतद् वचनं प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः ।
निशम्य भरतश्रेष्ठ बुद्ध्या परमयुक्तया ॥ ६ ॥

भरतश्रेष्ठ! धर्मशास्त्रके ज्ञाता मनुष्य अपनी परम योगयुक्त बुद्धिसे विचार करके यह उपर्युक्त बात कहते हैं ।। ६ ।।

अपि चोदाहरन्तीमं धर्मशास्त्रविदो जनाः ।
अश्वानां श्यामकर्णानां सहस्रेण स मुच्यते ।। ७ ।।
धर्मशास्त्रोंके विद्वान् यह भी कहते हैं कि प्रतिज्ञा-भंगका पाप करनेवाला पुरुष एक हजार श्यामकर्ण घोड़ोंका दान करनेसे उस पापसे मुक्त होता है ।। ७ ।।

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शृगालस्य च संवादं वानरस्य च भारत ।। ८ ।।
भारत! इस विषयमें विज्ञ पुरुष सियार और वानरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ८ ।।

तौ सखायौ पुरा ह्यास्तां मानुषत्वे परंतप ।
अन्यां योनिं समापन्नौ शार्गालीं वानरीं तथा ।। ९ ।।
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मनुष्य-जन्ममें जो दोनों पहले एक-दूसरेके मित्र थे, वे ही दूसरे जन्ममें सियार और वानरकी योनिमें प्राप्त हो गये ।। ९ ।।

ततः परासून् खादन्तं शृगालं वानरोऽब्रवीत् ।
श्मशानमध्ये सम्प्रेक्ष्य पूर्वजातिमनुस्मरन् ।। १० ।।
किं त्वया पापकं पूर्वं कृतं कर्म सुदारुणम् ।
यस्त्वं श्मशाने मृतकान् पूतिकानत्सि कुत्सितान् ।। ११ ।।
तदनन्तर एक दिन सियारको मरघटमें मुर्दे खाता देख वानरने पूर्व-जन्मका स्मरण करके पूछा—‘भैया! तुमने पहले जन्ममें कौन-सा भयंकर पाप किया था, जिससे तुम मरघटमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दे खा रहे हो?’ ।। १०-११ ।।

एवमुक्तः प्रत्युवाच शृगालो वानरं तदा ।
ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मया तदुपाहृतम् ॥ १२ ॥
तत्कृते पापकीं योनिमापन्नोऽस्मि प्लवङ्गम ।
तस्मादेवंविधं भक्ष्यं भक्षयामि बुभुक्षितः ॥ १३ ॥

वानरके इस प्रकार पूछनेपर सियारने उसे उत्तर दिया—‘भाई वानर! मैंने ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके वह वस्तु उसे नहीं दी थी। इसीके कारण मैं इस पापयोनिमें आ पड़ा हूँ और उसी पापसे भूखा होनेपर मुझे इस तरहका घृणित भोजन करना पड़ता है’ ॥ १२-१३ ॥

भीष्म उवाच

शृगालो वानरं प्राह पुनरेव नरोत्तम ।
किं त्वया पातकं कर्म कृतं येनासि वानरः ॥ १४ ॥

**भीष्मजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इसके बाद सियारने वानरसे पुनः पूछा—‘तुमने कौन-सा पाप किया था? जिससे वानर हो गये?’ ॥ १४ ॥

वानर उवाच

सदा चाहं फलाहारो ब्राह्मणानां प्लवङ्गमः ।

तस्मान्न ब्राह्मणस्वं तु हर्तव्यं विदुषा सदा । समं विवादो मोक्तव्यो दातव्यं स प्रतिश्रुतम् ॥ १५ ॥ **वानरने कहा—**मैं सदा ब्राह्मणोंका फल चुराकर खाया करता था; इसी पापसे वानर हुआ। अतः विज्ञ पुरुषको कभी ब्राह्मणका धन नहीं चुराना चाहिये। उनके साथ कभी झगड़ा नहीं करना चाहिये और उनके लिये जो वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा की गयी हो, वह अवश्य दे देनी चाहिये ॥ १५ ॥

भीष्म उवाच

इत्येतद् ब्रुवतो राजन् ब्राह्मणस्य मया श्रुतम् । कथां कथयतः पुण्यां धर्मज्ञस्य पुरातनीम् ॥ १६ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! यह कथा मैंने एक धर्मज्ञ ब्राह्मणके मुखसे सुनी है; जो प्राचीनकालकी पवित्र कथाएँ सुनाता था ॥ १६ ॥ श्रुतश्चापि मया भूयः कृष्णस्यापि विशाम्पते । कथां कथयतः पूर्वं ब्राह्मणं प्रति पाण्डव ॥ १७ ॥ प्रजानाथ! पाण्डुनन्दन! फिर मैंने यही बात भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भी सुनी थी; जब कि वे पहले किसी ब्राह्मणसे ऐसी ही कथा कह रहे थे ॥ १७ ॥ न हर्तव्यं विप्रधनं क्षन्तव्यं तेषु नित्यशः । बालाश्च नावमन्तव्या दरिद्राः कृपणा अपि ॥ १८ ॥ ब्राह्मणका धन कभी नहीं चुराना चाहिये। वे अपराध करें तो भी सदा उनके प्रति क्षमाभाव ही रखना चाहिये। वे बालक, दरिद्र अथवा दीन हों तो भी उनका अनादर नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥ एवमेव च मां नित्यं ब्राह्मणाः संदिशन्ति वै । प्रतिश्रुत्य भवेद् देयं नाशा कार्या द्विजोत्तमे ॥ १९ ॥ ब्राह्मणलोग भी मुझे सदा यही उपदेश दिया करते थे कि प्रतिज्ञा कर लेनेपर वह वस्तु ब्राह्मणको दे ही देनी चाहिये। किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणकी आशा भंग नहीं करनी चाहिये ॥ १९ ॥ ब्राह्मणो ह्याशया पूर्वं कृतया पृथिवीपते । सुसमिद्धो यथा दीप्तः पावकस्तद्विधः स्मृतः ॥ २० ॥ पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणको पहले आशा दे देनेपर वह समिधासे प्रज्वलित हुई अग्निके समान उद्दीप्त हो उठता है ॥ यं निरीक्षेत संक्रुद्ध आशया पूर्वजातया । प्रदहेच्च हि तं राजन् कक्षमक्षय्यभुग् यथा ॥ २१ ॥

राजन्! पहलेकी लगी हुई आशा भंग होनेसे अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण जिसकी ओर देख लेता है, उसे उसी प्रकार जलाकर भस्म कर डालता है, जैसे अग्नि सूखी लकड़ी अथवा तिनकोंके बोझको जला देती है ॥ २१ ॥ स एव हि यदा तुष्टो वचसा प्रतिनन्दति । भवत्यगदसंकाशो विषये तस्य भारत ॥ २२ ॥ भारत! वही ब्राह्मण जब आशापूर्तिसे संतुष्ट होकर वाणीद्वारा राजाका अभिनन्दन करता है—उसे आशीर्वाद देता है, तब उसके राज्यके लिये वह चिकित्सकके तुल्य हो जाता है ॥ २२ ॥ पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चैव बान्धवान् सचिवांस्तथा । पुरं जनपदं चैव शान्तिरिष्टेन पोषयेत् ॥ २३ ॥ तथा उस दाताके पुत्र-पौत्र, बन्धु-बान्धव, पशु, मन्त्री, नगर और जनपदके लिये वह शान्तिदायक बनकर उन्हें कल्याणका भागी बनाता और उन सबका पोषण करता है ॥ २३ ॥ एतद्धि परमं तेजो ब्राह्मणस्येह दृश्यते । सहस्रकिरणस्येव सवितुर्धरणीतले ॥ २४ ॥ इस पृथ्वीपर ब्राह्मणका उत्कृष्ट तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेवके समान दृष्टिगोचर होता है ॥ २४ ॥ तस्माद् दातव्यमेवेह प्रतिश्रुत्य युधिष्ठिर । यदिच्छेच्छोभनां जातिं प्राप्तुं भरतसत्तम ॥ २५ ॥ भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इसलिये जो उत्तम योनिमें जन्म लेना चाहता हो, उसे ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तु अवश्य दे डालनी चाहिये ॥ २५ ॥ ब्राह्मणस्य हि दत्तेन ध्रुवं स्वर्गो ह्यनुत्तमः । शक्यः प्राप्तुं विशेषेण दानं हि महती क्रिया ॥ २६ ॥ ब्राह्मणको दान देनेसे निश्चय ही परम उत्तम स्वर्गलोकको विशेष रूपसे प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि दान महान् पुण्यकर्म है ॥ २६ ॥ इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा । तस्माद् दानानि देयानि ब्राह्मणेभ्यो विजानता ॥ २७ ॥ इस लोकमें ब्राह्मणको दान देनेसे देवता और पितर तृप्त होते हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष ब्राह्मणको अवश्य दान दे ॥ २७ ॥ महद्धि भरतश्रेष्ठ ब्राह्मणस्तीर्थमुच्यते । वेलायां न तु कस्यांचिद् गच्छेद्विप्रो ह्यपूजितः ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मण महान् तीर्थ कहे जाते हैं; अतः वे किसी भी समय घरपर आ जायँ तो बिना सत्कार किये उन्हें नहीं जाने देना चाहिये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शृगालवानरसंवादे नवमोऽध्यायः॥ ९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सियार और वानरका संवादविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

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दशमोऽध्यायः

अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

मित्रसौहार्दयोगेन उपदेशं करोति यः ।
जात्याधरस्य राजर्षेर्दोषस्तस्य भवेन्न वा ॥ १ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवाः ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि कोई मित्रता या सौहार्दके सम्बन्धसे किसी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश देता है तो उस राजर्षिको दोष लगेगा या नहीं? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। आप इसका विशदरूपसे विवेचन करें; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है, जहाँ मनुष्य मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि शृणु राजन् यथाक्रमम् ।
ऋषीणां वदतां पूर्वं श्रुतमासीत् यथा पुरा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें पूर्वकालमें ऋषियोंके मुखसे जैसा मैंने सुना है, उसी क्रमसे बताऊँगा, तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित् ।
उपदेशे महान् दोष उपाध्यायस्य भाष्यते ॥ ४ ॥
किसी भी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश नहीं देना चाहिये। उसे उपदेश देनेपर उपदेशक आचार्यके लिये महान् दोष बताया जाता है ॥ ४ ॥
निदर्शनमिदं राजन् शृणु मे भरतर्षभ ।
दुरुक्तवचने राजन् यथापूर्वं युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
भरतभूषण राजा युधिष्ठिर! इस विषयमें एक दृष्टान्त सुनो, जो दुःखमें पड़े हुए एक नीच जातिके पुरुषको उपदेश देनेसे सम्बन्धित है ॥ ५ ॥
ब्रह्माश्रमपदे वृत्तं पार्श्वे हिमवतः शुभे ।
तत्राश्रमपदं पुण्यं नानावृक्षगणायुतम् ॥ ६ ॥
हिमालयके सुन्दर पार्श्वभागमें, जहाँ बहुत-से ब्राह्मणोंके आश्रम बने हुए हैं, यह वृत्तान्त घटित हुआ था। उस प्रदेशमें एक पवित्र आश्रम है जहाँ नाना प्रकारके हरे-भरे वृक्ष शोभा पाते हैं ॥ ६ ॥

नानागुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् । सिद्धचारणसंयुक्तं रम्यं पुष्पितकाननम् ॥ ७ ॥ नाना प्रकारकी लता-बेलें वहाँ छायी हुई हैं। मृग और पक्षी उस आश्रमका सेवन करते हैं। सिद्ध और चारण वहाँ सदा निवास करते हैं। उस रमणीय आश्रमके आस-पासका वन सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित है ॥ ७ ॥

व्रतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुपसेवितम् । ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसंनिभैः ॥ ८ ॥ बहुत-से व्रतपरायण तपस्वी उस आश्रमका सेवन करते हैं। कितने ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी महाभाग ब्राह्मण वहाँ भरे रहते हैं ॥ ८ ॥

नियमव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः । दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! नियम और व्रतसे सम्पन्न, तपस्वी, दीक्षित, मिताहारी और जितात्मा मुनियोंसे वह आश्रम भरा रहता है ॥ ९ ॥

तपोऽध्ययनघोषैश्च नादितं भरतर्षभ । वालखिल्यैश्च बहुभिर्यतिभिश्च निषेवितम् ॥ १० ॥ भरतभूषण! वहाँ सब ओर वेदाध्ययनकी ध्वनि गूँजती रहती है। बहुत-से वालखिल्य एवं संन्यासी उस आश्रमका सेवन करते हैं ॥ १० ॥

तत्र कश्चित् समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दयान्वितः । आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः ॥ ११ ॥ उसी आश्रममें कोई दयालु शूद्र बड़ा उत्साह करके आया। वहाँ रहनेवाले तपस्वी ऋषियोंने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ ११ ॥

तांस्तु दृष्ट्वा मुनिगणान् देवकल्पान् महौजसः । विविधां वहतो दीक्षां सम्प्राहृष्यत भारत ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! उस आश्रमके महातेजस्वी देवोपम मुनियोंको नाना प्रकारकी दीक्षा धारण किये देख उस शूद्रको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२ ॥

अथास्य बुद्धिरभवत् तपस्ये भरतर्षभ । ततोऽब्रवीत् कुलपतिं पादौ संगृह्य भारत ॥ १३ ॥ भारत! भरतभूषण! उसके मनमें वहाँ तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ; अतः उसने कुलपतिके पैर पकड़कर कहा— ॥ १३ ॥

भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं वक्तुं द्विजर्षभ । तन्मां त्वं भगवन् वक्तुं प्रव्राजयितुमर्हसि ॥ १४ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! मैं आपकी कृपासे धर्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। अतः भगवन्! आप मुझे विधिवत् संन्यासीकी दीक्षा दे दें’ ॥ १४ ॥

वर्णावरोऽहं भगवन् शूद्रो जात्यास्मि सत्तम ।
शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे ॥ १५ ॥
‘भगवन्! साधुशिरोमणे! मैं वर्णोंमें सबसे छोटा शूद्र जातिका हूँ और यहीं रहकर संतोंकी सेवा करना चाहता हूँ; अतः मुझ शरणागतपर आप प्रसन्न हों’ ॥ १५ ॥

कुलपतिरुवाच
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् ।
आस्यतां यदि ते बुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ॥ १६ ॥
शुश्रूषया पराँल्लोकानवाप्स्यसि न संशयः ॥ १७ ॥
कुलपतिने कहा—इस आश्रममें कोई शूद्र संन्यासका चिह्न धारण करके नहीं रह सकता। यदि तुम्हारा विचार यहाँ रहनेका हो तो यों ही रहो और साधु-महात्माओंकी सेवा करो। सेवासे ही तुम उत्तम लोक प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥

भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयन्नृप ।
कथमत्र मया कार्यं श्रद्धा धर्मपरा च मे ॥ १८ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरेश्वर! मुनिके ऐसा कहनेपर शूद्रने सोचा, यहाँ मुझे क्या करना चाहिये? मेरी श्रद्धा तो संन्यास-धर्मके अनुष्ठानके लिये ही है ॥ १८ ॥

विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रियमात्मनः ।
गत्वाऽऽश्रमपदाद् दूरमुटजं कृतवांस्तु सः ॥ १९ ॥
अच्छा, एक बात समझमें आयी। शूद्रके लिये ऐसा ही विधान हो तो रहे। मैं तो वही करूँगा जो मुझे प्रिय लगता है—ऐसा विचारकर उसने उस आश्रमसे दूर जाकर एक पर्णकुटी बना ली ॥ १९ ॥

तत्र वेदीं च भूमिं च देवतायतनानि च ।
निवेश्य भरतश्रेष्ठ नियमस्थोऽभवन्मुनिः ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ यज्ञके लिये वेदी, रहनेके लिये स्थान और देवालय बनाकर मुनिकी भाँति नियमपूर्वक रहने लगा ॥ २० ॥

अभिषेकांश्च नियमान् देवतायतनेषु च ।
बलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजयत् ॥ २१ ॥
वह तीनों समय नहाता, नियमोंका पालन करता, देव-स्थानोंमें पूजा चढ़ाता, अग्निमें आहुति देता और देवताकी पूजा करता था ॥ २१ ॥

संकल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेन्द्रियः ।
नित्यं संनिहिताभिस्तु ओषधीभिः फलैस्तथा ॥ २२ ॥
अतिथीन् पूजयामास यथावत् समुपागतान् ।

एवं हि सुमहान् कालो व्यत्यक्रामत तस्य वै ॥ २३ ॥

वह मानसिक संकल्पोंका नियन्त्रण (चित्तवृत्तियोंका निरोध) करते हुए फल खाकर

रहता और इन्द्रियोंको काबूमें रखता था। उसके यहाँ जो अन्न और फल उपस्थित रहता,

उन्हींके द्वारा प्रतिदिन आये हुए अतिथियोंका यथोचित सत्कार करता था। इस प्रकार रहते

हुए उस शूद्र मुनिको बहुत समय बीत गया ॥

अथास्य मुनिरागच्छत् संगत्या वै तमाश्रमम् ।

सम्पूज्य स्वागतेनर्षिं विधिवत् समतोषयत् ॥ २४ ॥

एक दिन एक मुनि सत्संगकी दृष्टिसे उसके आश्रमपर पधारे। उस शूद्रने विधिवत्

स्वागत-सत्कार करके ऋषिका पूजन किया और उन्हें संतुष्ट कर दिया ॥

अनुकूलाः कथाः कृत्वा यथागतमपृच्छत ।

ऋषिः परमतेजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ २५ ॥

एवं सुबहुशस्तस्य शूद्रस्य भरतर्षभ ।

सोऽगच्छदाश्रममृषिः शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभ ॥ २६ ॥

भरतभूषण नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उसने अनुकूल बातें करके उनके आगमनका वृत्तान्त

पूछा। तबसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे परम तेजस्वी धर्मात्मा ऋषि अनेक बार उस

शूद्रके आश्रमपर उससे मिलनेके लिये आये ॥ २५-२६ ॥

अथ तं तापसं शूद्रः सोऽब्रवीद् भरतर्षभ ।

पितृकार्यं करिष्यामि तत्र मेऽनुग्रहं कुरु ॥ २७ ॥

भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस शूद्रने उन तपस्वी मुनिसे कहा—'मैं पितरोंका श्राद्ध करूँगा।

आप उसमें मुझपर अनुग्रह कीजिये' ॥ २७ ॥

बाढमित्येव तं विप्र उवाच भरतर्षभ ।

शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षेः पाद्यमानयत् ॥ २८ ॥

भरतभूषण नरेश! तब ब्राह्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर उसका निमन्त्रण स्वीकार कर

लिया। तत्पश्चात् शूद्र नहा-धोकर शुद्ध हो उन ब्रह्मर्षिके पैर धोनेके लिये जल ले

आया ॥ २८ ॥

अथ दर्भांश्च वन्यांश्च ओषधीर्भरतर्षभ ।

पवित्रमासनं चैव बृसीं च समुपानयत् ॥ २९ ॥

भरतर्षभ! तदनन्तर वह जंगली कुशा, अन्न आदि ओषधि, पवित्र आसन और कुशकी

चटाई ले आया ॥

अथ दक्षिणमावृत्य बृसीं चरमशौर्षिकीम् ।

कृतामन्यायतो दृष्ट्वा तं शूद्रमृषिरब्रवीत् ॥ ३० ॥

उसने दक्षिण दिशामें ले जाकर ब्राह्मणके लिये पश्चिमाग्र चटाई बिछा दी। यह शास्त्रके

विपरीत अनुचित आचार देखकर ऋषिने शूद्रसे कहा— ॥ ३० ॥

कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भवांश्चोदङ्मुखः शुचिः । स च तत् कृतवान् शूद्रः सर्वं यदृषिरब्रवीत् ॥ ३१ ॥ 'तुम इस कुशकी चटाईका अग्रभाग तो पूर्व दिशाकी ओर करो और स्वयं शुद्ध होकर उत्तराभिमुख बैठो।' ऋषिने जो-जो कहा, शूद्रने वह सब किया ॥ ३१ ॥ यथोपदिष्टं मेधावी दर्भाग्र्यादि यथातथम् । हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना ॥ ३२ ॥ बुद्धिमान् शूद्रने कुश, अर्घ्य आदि तथा हव्य-कव्यकी विधि—सब कुछ उन तपस्वी मुनिके उपदेशके अनुसार ठीक-ठीक किया ॥ ३२ ॥ ऋषिणा पितृकार्ये च स च धर्मपथे स्थितः । पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ॥ ३३ ॥ ऋषिके द्वारा पितृकार्य विधिवत् सम्पन्न हो जानेपर वे ऋषि शूद्रसे विदा लेकर चले गये और वह शूद्र धर्ममार्गमें स्थित हो गया ॥ ३३ ॥ अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यन् शूद्रतापसः । वने पञ्चत्वमगमत् सुकृतेन च तेन वै ॥ ३४ ॥ अजायत महाराजवंशे स च महाद्युतिः । तदनन्तर दीर्घकालतक तपस्या करके वह शूद्र तपस्वी वनमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ और उसी पुण्यके प्रभावसे एक महान् राजवंशमें महातेजस्वी बालकके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३४ १/२ ॥ तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह ॥ ३५ ॥ पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ । एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा ॥ ३६ ॥ क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ॥ ३७ ॥ तात! इसी प्रकार वे ऋषि भी कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हुए। भरतश्रेष्ठ! वे ही ऋषि दूसरे जन्ममें उसी राजवंशके पुरोहितके कुलमें उत्पन्न हुए। इस प्रकार वह शूद्र और वे मुनि दोनों ही वहाँ उत्पन्न हुए, क्रमशः बढ़े और सब प्रकारकी विद्याओंमें निपुण हो गये ॥ अथर्ववेदे वेदे च बभूवर्षिः सुनिश्चितः । कल्पप्रयोगे चोत्पन्ने ज्योतिषे च परं गतः ॥ ३८ ॥ सांख्ये चैव परा प्रीतिस्तस्य चैवं व्यवर्धत । वे ऋषि वेद और अथर्ववेदके परिनिष्ठित विद्वान् हो गये। कल्पप्रयोग और ज्योतिषमें भी पारंगत हुए। सांख्यमें भी उनका परम अनुराग बढ़ने लगा ॥ ३८ १/२ ॥ पितर्युपरते चापि कृतशौचस्तु पार्थिव ॥ ३९ ॥ अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः ।