महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1159, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयज्ञोपवीतधरणं यज्ञो धर्मक्रियास्तथा । भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ॥ ५० ॥ सम्यग्दण्डे स्थितिर्धर्मो धर्मो वेदक्रतुक्रियाः । व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ॥ ५१ ॥ राजाका परम धर्म है—इन्द्रियसंयम, स्वाध्याय, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, यज्ञोपवीत-धारण, यज्ञानुष्ठान, धार्मिक कार्यका सम्पादन, पोष्यवर्गका भरण-पोषण, आरम्भ किये हुए कर्मको सफल बनाना, अपराधके अनुसार उचित दण्ड देना, वैदिक यज्ञादि कर्मोंका अनुष्ठान करना, व्यवहारमें न्यायकी रक्षा करना और सत्यभाषणमें अनुरक्त होना। ये सभी कर्म राजाके लिये धर्म ही हैं ॥ आर्तहस्तप्रदो राजा प्रेत्य चेह महीयते । गोब्राह्मणार्थे विक्रान्तः संग्रामे निधनं गतः ॥ ५२ ॥ अश्वमेधजिताँल्लोकानाप्नोति त्रिदिवालये ॥ ५३ ॥ जो राजा दुखी मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, वह इस लोक और परलोकमें भी सम्मानित होता है। गौओं और ब्राह्मणोंको संकटसे बचानेके लिये जो पराक्रम दिखाकर संग्राममें मृत्युको प्राप्त होता है, वह स्वर्गमें अश्वमेध यज्ञोंद्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार जमा लेता है ॥ ५२-५३ ॥ (तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः । अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्षफलदा हि ते ॥ यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवेयुस्तथा परे ।) देवि! इसी प्रकार वैश्य भी लोगोंकी जीवन-यात्राके निर्वाहमें सहायक माने गये हैं। दूसरे वर्णोंके लोग उन्हींके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं। यदि वैश्य न हों तो दूसरे वर्णके लोग भी न रहें ॥ वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ५४ ॥ वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः । विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः ॥ ५५ ॥ पशुओंका पालन, खेती, व्यापार, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, सन्मार्गका आश्रय लेकर सदाचारका पालन, अतिथि-सत्कार, शम, दम, ब्राह्मणोंका स्वागत और त्याग—ये सब वैश्योंके सनातन धर्म हैं ॥ ५४-५५ ॥ तिलान् गन्धान् रसांश्चैव विक्रीणीयान्न चैव हि । वणिक्पथमुपासीनो वैश्यः सत्पथमाश्रितः ॥ ५६ ॥ सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यथार्हतः ।