भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1160, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1160

व्यापार करनेवाले सदाचारी वैश्यको तिल, चन्दन और रसकी बिक्री नहीं करनी चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इस त्रिवर्गका सब प्रकारसे यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ॥

शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु ॥ ५७ ॥
स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
शुश्रूषुरतिथिं प्राप्तं तपः संचिनुते महत् ॥ ५८ ॥
शूद्रका परम धर्म है तीनों वर्णोंकी सेवा। जो शूद्र सत्यवादी, जितेन्द्रिय और घरपर आये हुए अतिथिकी सेवा करनेवाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है। उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है ॥ ५७-५८ ॥

नित्यं स हि शुभाचारो देवताद्विजपूजकः ।
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रयुज्येत बुद्धिमान् ॥ ५९ ॥
नित्य सदाचारका पालन और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले बुद्धिमान् शूद्रको धर्मका मनोवांछित फल प्राप्त होता है ॥ ५९ ॥

(तथैव शूद्रा विहिताः सर्वधर्मप्रसाधकाः ।
शूद्राश्च यदि ते न स्युः कर्मकर्ता न विद्यते ॥
इसी प्रकार शूद्र भी सम्पूर्ण धर्मोंके साधक बताये गये हैं। यदि शूद्र न हों तो सेवाका कार्य करनेवाला कोई नहीं है ॥

त्रयः पूर्वे शूद्रमूलाः सर्वे कर्मकराः स्मृताः ।
ब्राह्मणादिषु शुश्रूषा दासधर्म इति स्मृतः ॥
पहलेके जो तीन वर्ण हैं, वे सब शूद्रमूलक ही हैं, क्योंकि शूद्र ही सेवाका कर्म करनेवाले माने गये हैं। ब्राह्मण आदिकी सेवा ही दास या शूद्रका धर्म माना गया है ॥

वार्ता च कारुकर्माणि शिल्पं नाट्यं तथैव च ।
अहिंसकः शुभाचारो दैवतद्विजवन्दकः ॥
वाणिज्य, कारीगरके कार्य, शिल्प तथा नाट्य भी शूद्रका धर्म है। उसे अहिंसक, सदाचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ॥

शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः स्वधर्मेणोपयुज्यते ।
एवमादि तथान्यच्च शूद्रधर्म इति स्मृतः ॥)
ऐसा शूद्र अपने धर्मसे सम्पन्न और उसके अभीष्ट फलोंका भागी होता है। यह तथा और भी शूद्र-धर्म कहा गया है ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं चातुर्वर्ण्यस्य शोभने ।
एकैकस्येह सुभगे किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ६० ॥
शोभने! इस प्रकार मैंने तुम्हें एक-एक करके चारों वर्णोंका सारा धर्म बतलाया। सुभगे! अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ६० ॥