भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1161, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1161

उमोवाच

(भगवन् देवदेवेश नमस्ते वृषभध्वज ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं देव धर्ममाश्रमिणां विभो ॥
उमा बोलीं— भगवन्! देवदेवेश्वर! वृषभध्वज! देव! आपको नमस्कार है। प्रभो! अब मैं आश्रमियोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तथाश्रमगतं धर्मं शृणु देवि समाहिता ।
आश्रमाणां तु यो धर्मः क्रियते ब्रह्मवादिभिः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! एकाग्रचित्त होकर आश्रमधर्मका वर्णन सुनो। ब्रह्मवादी मुनियोंने आश्रमोंका जो धर्म निश्चित किया है, वही यहाँ बताया जा रहा है ॥
गृहस्थः प्रवरस्तेषां गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रितः ।
पञ्चयज्ञक्रिया शौचं दारतुष्टिरतन्द्रिता ॥
ऋतुकालाभिगमनं दानयज्ञतपांसि च ।
अविप्रवासस्तस्येष्टः स्वाध्यायश्चाग्निपूर्वकम् ॥
आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह गार्हस्थ्य धर्मपर प्रतिष्ठित है। पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान, बाहर-भीतरकी पवित्रता, अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहना, आलस्यको त्याग देना, ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करना, दान, यज्ञ और तपस्यामें लगे रहना, परदेश न जाना और अग्निहोत्रपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना—ये गृहस्थके अभीष्ट धर्म हैं ॥
तथैव वानप्रस्थस्य धर्माः प्रोक्ताः सनातनाः ।
गृहवासं समुत्सृज्य निश्चित्यैकमनाः शुभैः ॥
वन्यैरेव सदाहारैर्वर्तयेदिति च स्थितिः ।
इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रमके सनातन धर्म बताये गये हैं। वानप्रस्थ आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छावाला पुरुष एकचित्त होकर निश्चय करनेके पश्चात् घरका रहना छोड़कर वनमें चला जाय और वनमें प्राप्त होनेवाले उत्तम आहारोंसे ही जीवन-निर्वाह करे। यही उसके लिये शास्त्रविहित मर्यादा है ॥
भूमिशय्या जटाश्मश्रुचर्मवल्कलधारणम् ॥
देवतातिथिसत्कारो महाकृच्छ्राभिपूजनम् ।
अग्निहोत्रं त्रिषवणं तस्य नित्यं विधीयते ॥
ब्रह्मचर्यं क्षमा शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।
एवं स विगते प्राणे देवलोके महीयते ॥