भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1162, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1162

पृथ्वीपर सोना, जटा और दाढ़ी-मूँछ रखना, मृगचर्म और वल्कल वस्त्र धारण करना, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करना, महान् कष्ट सहकर भी देवताओंकी पूजा आदिका निर्वाह करना—यह वानप्रस्थ-का नियम है। उसके लिये प्रतिदिन अग्निहोत्र और त्रिकाल-स्नानका विधान है। ब्रह्मचर्य, क्षमा और शौच आदि उसका सनातन धर्म है। ऐसा करनेवाला वानप्रस्थ प्राणत्यागके पश्चात् देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥

यतिधर्मास्तथा देवि गृहांस्त्यक्त्वा यतस्ततः।
आकिञ्चन्यमनारम्भः सर्वतः शौचमार्जवम्॥
सर्वत्र भैक्षचर्या च सर्वत्रैव विवासनम्।
सदा ध्यानपरत्वं च दोषशुद्धिः क्षमा दया॥
तत्त्वानुगतबुद्धित्वं तस्य धर्मविधिर्भवेत्।

देवि! यतिधर्म इस प्रकार है। संन्यासी घर छोड़कर इधर-उधर विचरता रहे। वह अपने पास किसी वस्तुका संग्रह न करे। कर्मोंके आरम्भ या आयोजनसे दूर रहे। सब ओरसे पवित्रता और सरलताको वह अपने भीतर स्थान दे। सर्वत्र भिक्षासे जीविका चलावे। सभी स्थानोंसे वह विलग रहे। सदा ध्यानमें तत्पर रहना, दोषोंसे शुद्ध होना, सबपर क्षमा और दयाका भाव रखना तथा बुद्धिको तत्त्वके चिन्तनमें लगाये रखना—ये सब संन्यासीके लिये धर्मकार्य हैं॥

बुभुक्षितं पिपासार्तमतिथिं श्रान्तमागतम्।
अर्चयन्ति वरारोहे तेषामपि फलं महत्॥

वरारोहे! जो भूख-प्याससे पीड़ित और थके-मांदे आये हुए अतिथिकी सेवा-पूजा करते हैं, उन्हें भी महान् फलकी प्राप्ति होती है॥

पात्रमित्येव दातव्यं सर्वस्मै धर्मकाङ्क्षिभिः।
आगमिष्यति यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति॥

धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि अपने घरपर आये हुए सभी अतिथियोंको दानका उत्तम पात्र समझकर दान दें। उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि आज जो पात्र आयेगा, वह हमारा उद्धार कर देगा।

काले सम्प्राप्तमतिथिं भोक्तुकाममुपस्थितम्।
यस्तं सम्भावयेत् तत्र व्यासोऽयं समुपस्थितः॥

समयपर भोजनकी इच्छासे आये अथवा उपस्थित हुए अतिथिका जो समादर करता है, वहाँ ये साक्षात् भगवान् व्यास उपस्थित होते हैं॥

तस्य पूजां यथाशक्त्या सौम्यचित्तः प्रयोजयेत्।
चित्तमूलो भवेद् धर्मो धर्ममूलं भवेद् यशः॥

अतः कोमलचित्त होकर उस अतिथिकी यथा-शक्ति पूजा करनी चाहिये; क्योंकि धर्मका मूल है चित्तका विशुद्ध भाव और यशका मूल है धर्म॥