महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1163, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मात् सौम्येन चित्तेन दातव्यं देवि सर्वथा ।
सौम्यचित्तस्तु यो दद्यात् तद्धि दानमनुत्तमम् ॥
अतः देवि! सर्वथा सौम्यचित्तसे दान देना चाहिये; क्योंकि जो सौम्यचित्त होकर दान देता है, उसका वह दान सर्वोत्तम होता है ॥
यथाम्बुबिन्दुभिः सूक्ष्मैः पतद्भिर्मेदिनीतले ।
केदारश्च तटाकानि सरांसि सरितस्तथा ॥
तोयपूर्णानि दृश्यन्ते अप्रतर्क्यानि शोभने ।
अल्पमल्पमपि ह्येकं दीयमानं विवर्धते ॥
शोभने! जैसे भूतलपर वर्षाके समय गिरती हुई जलकी छोटी-छोटी बूँदोंसे ही खेतोंकी क्यारियाँ, तालाब, सरोवर और सरिताएँ अतर्क्य भावसे जलपूर्ण दिखायी देती हैं, उसी प्रकार एक-एक करके थोड़ा-थोड़ा दिया हुआ दान भी बढ़ जाता है ॥
पीडयापि च भृत्यानां दानमेव विशिष्यते ।
पुत्रदारधनं धान्यं न मृतमनुगच्छति ॥
भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंको थोड़ा-सा कष्ट देकर भी यदि दान किया जा सके तो दान ही श्रेष्ठ माना गया है। स्त्री-पुत्र, धन और धान्य—ये वस्तुएँ मरे हुए पुरुषोंके साथ नहीं जाती हैं ॥
श्रेयो दानं च भोगश्च धनं प्राप्य यशस्विनि ।
दानेन हि महाभागा भवन्ति मनुजाधिपाः ॥
नास्ति भूमौ दानसमं नास्ति दानसमो निधिः ।
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ॥
यशस्विनि! धन पाकर उसका दान और भोग करना भी श्रेष्ठ है; परंतु दान करनेसे मनुष्य महान् सौभाग्यशाली नरेश होते हैं। इस पृथ्वीपर दानके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। दानके समान कोई निधि नहीं है। सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्यसे बढ़कर कोई पातक नही है ॥
आश्रमे यस्तु तप्येत तपो मूलफलाशनः ।
आदित्याभिमुखो भूत्वा जटावल्कलसंवृतः ॥
मण्डूकशायी हेमन्ते ग्रीष्मे पञ्चतपा भवेत् ।
सम्यक् तपश्चरन्तीह श्रद्दधाना वनाश्रमे ॥
गृहाश्रमस्य ते देवि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
जो वानप्रस्थ आश्रममें फल-मूल खाकर जटा बढ़ाये, वल्कल पहने, सूर्यकी ओर मुँह करके तपस्या करता है, हेमन्त-ऋतुमें मेढककी भाँति जलमें सोता है और ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निका ताप सहन करता है। इस प्रकार जो लोग वानप्रस्थ आश्रममें रहकर श्रद्धापूर्वक