महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तम तप करते हैं, वे भी गृहस्थाश्रमके पालनसे होनेवाले धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते॥
उमोवाच
गृहाश्रमस्य या चर्या व्रतानि नियमाश्च ये ।।
यथा च देवताः पूज्याः सततं गृहमेधिना ।
यद् यच्च परिहर्तव्यं गृहिणा तिथिपर्वसु ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यमानं त्वया विभो ।
उमाने कहा— प्रभो! गृहस्थाश्रमका जो आचार है, जो व्रत और नियम हैं, गृहस्थको सदा जिस प्रकारसे देवताओंकी पूजा करनी चाहिये तथा तिथि और पर्वोंके दिन उसे जिस-जिस वस्तुका त्याग करना चाहिये, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहती हूँ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
गृहाश्रमस्य यन्मूलं फलं धर्मोऽयमुत्तमः ।।
पादैश्चतुर्भिः सततं धर्मो यत्र प्रतिष्ठितः ।
सारभूतं वरारोहे दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ।।
तदहं ते प्रवक्ष्यामि श्रूयतां धर्मचारिणि ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! गृहस्थ-आश्रमका जो मूल और फल है, यह उत्तम धर्म जहाँ अपने चारों चरणोंसे सदा विराजमान रहता है, वरारोहे! जैसे दहीसे घी निकाला जाता है, उसी प्रकार जो सब धर्मोंका सारभूत है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। धर्मचारिणि! सुनो॥
शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे ।।
भर्तारं चैव या नारी अग्निहोत्रं च ये द्विजाः ।
तेषु तेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः ।।
पितरः पितृलोकस्थाः स्वधर्मेण स रज्यते ।
जो लोग गृहस्थ-आश्रममें रहकर माता-पिताकी सेवा करते हैं, जो नारी पतिकी सेवा करती है तथा जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र कर्म करते हैं, उन सबपर इन्द्र आदि देवता, पितृलोकनिवासी पितर प्रसन्न होते हैं एवं वह पुरुष अपने धर्मसे आनन्दित होता है॥
उमोवाच
मातापितृवियुक्तानां का चर्या गृहमेधिनाम् ।।
विधवानां च नारीणां भवानेतद् ब्रवीतु मे ।
उमाने पूछा— जिन गृहस्थोंके माता-पिता न हों, उनकी अथवा विधवा स्त्रियोंकी जीवनचर्या क्या होनी चाहिये? यह मुझे बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच