महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1165, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवतातिथिशुश्रूषा गुरुवृद्धाभिवादनम् ।। अहिंसा सर्वभूतानामलोभः सत्यसंधता । ब्रह्मचर्यं शरण्यत्वं शौचं पूर्वाभिभाषणम् ।। कृतज्ञत्वमपैशुन्यं सततं धर्मशीलता । दिने द्विरभिषेकं च पितृदैवतपूजनम् ।। गवाह्निकप्रदानं च संविभागोऽतिथिष्वपि । दीपं प्रतिश्रयं चैव दद्यात् पाद्यासनं तथा ।। पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा द्वादशेऽप्यष्टमेऽपि वा । चतुर्दशे पञ्चदशे ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।। श्मश्रुकर्म शिरोऽभ्यङ्गमञ्जनं दन्तधावनम् । नैतेष्वहस्सु कुर्वीत तेषु लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवता और अतिथियोंकी सेवा, गुरुजनों तथा वृद्ध पुरुषोंका अभिवादन, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, लोभको त्याग देना, सत्यप्रतिज्ञ होना, ब्रह्मचर्य, शरणागतवत्सलता, शौचाचार, पहले बातचीत करना, उपकारीके प्रति कृतज्ञ होना, किसीकी चुगली न खाना, सदा धर्मशील रहना, दिनमें दो बार स्नान करना, देवता और पितरोंका पूजन करना, गौओंको प्रतिदिन अन्नका ग्रास और घास देना, अतिथियोंको विभागपूर्वक भोजन देना, दीप, ठहरनेके लिये स्थान तथा पाद्य और आसन देना, पंचमी, षष्ठी, द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करना, इन तिथियोंपर मूँछ मुड़ाने, सिरमें तेल लगाने, आँखमें अंजन करने तथा दाँतुन करने एवं दाँत धोने आदिका कार्य न करे। जो इन विधि-निषेधोंका पालन करते हैं, उनके यहाँ लक्ष्मी प्रतिष्ठित होती हैं ।। व्रतोपवासनियमस्तपो दानं च शक्तितः । भरणं भृत्यवर्गस्य दीनानामनुकम्पनम् ।। परदारनिवृत्तिश्च स्वदारेषु रतिः सदाः । व्रत और उपवासका नियम पालना, तपस्या करना, यथाशक्ति दान देना, पोष्यवर्गका पोषण करना, दीनोंपर कृपा रखना, परायी स्त्रीसे दूर रहना तथा सदा ही अपनी स्त्रीसे प्रेम रखना गृहस्थका धर्म है ।। शरीरमेकं दम्पत्योर्विधात्रा पूर्वनिर्मितम् ।। तस्मात् स्वदारनिरतो ब्रह्मचारी विधीयते । विधाताने पूर्वकालमें पति-पत्नीका एक ही शरीर बनाया था; अतः अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहनेवाला पुरुष ब्रह्मचारी माना जाता है ।। शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च ।। आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ।