भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1166, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1166

प्रियातिथेश्च क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च ।। गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यैः कृत्यमाश्रमैः । जो शील और सदाचारसे विनीत है, जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखा है, जो सरलतापूर्वक बर्ताव करता है और समस्त प्राणियोंका हितैषी है, जिसको अतिथि प्रिय है, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया है—ऐसे गृहस्थके लिये अन्य आश्रमोंकी क्या आवश्यकता है? ।।

यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ।। तथा गृहाश्रमं प्राप्य सर्वे जीवन्ति चाश्रमाः । जैसे सभी जीव माताका सहारा लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम गृहस्थ-आश्रमका आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करते हैं ।।

राजानः सर्वपाषण्डाः सर्वे रङ्गोपजीविनः ।। व्यालग्रहाश्च दम्भाश्च चोरा राजभटास्तथा । सविद्याः सर्वशीलज्ञाः सर्वे वै विचिकित्सकाः ।। दूराध्वानं प्रपन्नाश्च क्षीणपथ्योदना नराः । एते चान्ये च बहवः तर्कयन्ति गृहाश्रमम् ।। राजा, पाखण्डी, नट, सपेरा, दम्भ, चोर, राजपुरुष, विद्वान्, सम्पूर्ण शीलोंके जानकार, सभी संशयालु तथा दूरके रास्तेपर आये हुए पाथेयरहित राही—ये तथा और भी बहुत-से मनुष्य गृहस्थ-आश्रमपर ही ताक लगाये रहते हैं ।।

मार्जारा मूषिकाः श्वानः सूकराश्च शुकास्तथा । कपोतका कर्कटकाः सरीसृपनिषेवणाः ।। अरण्यवासिनश्चान्ये सङ्घा ये मृगपक्षिणाम् । एवं बहुविधा देवि लोकेऽस्मिन् सचराचराः ।। गृहे क्षेत्रे बिले चैव शतशोऽथ सहस्रशः । गृहस्थेन कृतं कर्म सर्वैस्तैरिह भुज्यते ।। देवि! चूहे, बिल्ली, कुत्ते, सुअर, तोते, कबूतर, कर्कटक (काक आदि), सरीसृपसेवी—ये तथा और भी बहुत-से मृग-पक्षियोंके वनवासी समुदाय हैं तथा इसी तरह इस जगत्में जो नाना प्रकारके सैकड़ों और हजारों चराचर प्राणी घर, क्षेत्र और बिलमें निवास करते हैं, वे सब-के-सब यहाँ गृहस्थके किये हुए कर्मको ही भोगते हैं ।।

उपयुक्तं च यत् तेषां मतिमान् नानुशोचति । धर्म इत्येव संकल्प्य यस्तु तस्य फलं शृणु ।। जो वस्तु उनके उपयोगमें आ गयी, उसके लिये जो बुद्धिमान् पुरुष कभी शोक नहीं करता, इन सबका पालन करना धर्म ही है, ऐसा समझकर संतुष्ट रहता है, उसे मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो ।।