भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1168, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1168

जो तीनों वेदोंका ज्ञाता और विद्वान् हो; पढ़ने-पढ़ानेका काम करके जीविका न चलाता हो; दान, धर्म और यज्ञ—इन तीन कर्मोंका सदा अनुष्ठान करता हो; काम, क्रोध और लोभ—इन तीनों दोषोंका त्याग कर चुका हो और सब प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखता हो—ऐसा पुरुष ही वास्तवमें ब्राह्मण माना गया है ॥ ६६ ॥ षडिमानि तु कर्माणि प्रोवाच भुवनेश्वरः । वृत्त्यर्थं ब्राह्मणानां वै शृणु धर्मान् सनातनान् ॥ ६७ ॥ सम्पूर्ण भुवनोंके स्वामी ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंकी जीविकाके लिये ये छः कर्म बताये हैं; जो उनके लिये सनातन धर्म हैं। इनके नाम सुनो ॥ ६७ ॥ यजनं याजनं चैव तथा दानप्रतिग्रहौ । अध्यापनं चाध्ययनं षट्कर्मा धर्मभाग् द्विजः ॥ ६८ ॥ यजन-याजन (यज्ञ करना-कराना), दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना। इन छः कर्मोंका आश्रय लेनेवाला ब्राह्मण धर्मका भागी होता है ॥ ६८ ॥ नित्यः स्वाध्यायिता धर्मो धर्मो यज्ञः सनातनः । दानं प्रशस्यते चास्य यथाशक्ति यथाविधि ॥ ६९ ॥ इनमें भी सदा स्वाध्यायशील होना ब्राह्मणका मुख्य धर्म है, यज्ञ करना सनातन धर्म है और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दान देना उसके लिये प्रशस्त धर्म है ॥ शमस्तूपरमो धर्मः प्रवृत्तः सत्सु नित्यशः । गृहस्थानां विशुद्धानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ ७० ॥ सब प्रकारके विषयोंसे उपरत होना शम कहलाता है। यह सत्पुरुषोंमें सदा दृष्टिगोचर होता है। इसका पालन करनेसे शुद्ध चित्तवाले गृहस्थोंको महान् धर्म-राशिकी प्राप्ति होती है ॥ ७० ॥ पञ्चयज्ञविशुद्धात्मा सत्यवागनसूयकः । दाता ब्राह्मणसत्कर्ता सुसंसृष्टनिवेशनः ॥ ७१ ॥ अमानी च सदाजिह्मः स्निग्धवाणीप्रदस्तथा । अतिथ्यभ्यागतरतिः शेषात्नकृतभोजनः ॥ ७२ ॥ पाद्यमर्घ्यं यथान्यायमासनं शयनं तथा । दीपं प्रतिश्रयं चैव यो ददाति स धार्मिकः ॥ ७३ ॥ गृहस्थ पुरुषको पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने मनको शुद्ध बनाना चाहिये। जो गृहस्थ सदा सत्य बोलता, किसीके दोष नहीं देखता, दान देता, ब्राह्मणोंका सत्कार करता, अपने घरको झाड़-बुहारकर साफ रखता, अभिमानको त्याग देता, सदा सरल भावसे रहता, स्नेहयुक्त वचन बोलता, अतिथि और अभ्यागतोंकी सेवामें मन लगाता, यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता और अतिथिको शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार पाद्य, अर्घ्य, आसन,