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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1169, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1169

शय्या, दीपक तथा ठहरनेके लिये गृह प्रदान करता है, उसे धार्मिक समझना चाहिये ।। ७१—७३ ।।

प्रातरुत्थाय चाचम्य भोजनेनोपमन्त्र्य च । सत्कृत्यानुव्रजेद् यस्तु तस्य धर्मः सनातनः ।। ७४ ।। जो प्रातःकाल उठकर आचमन करके ब्राह्मणोंको भोजनके लिये निमन्त्रण देता और उसे ठीक समयपर सत्कारपूर्वक भोजन करानेके बाद कुछ दूरतक उसके पीछे-पीछे जाता है, उसके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ।। ७४ ।।

सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति निशानिशम् । शूद्रधर्मः समाख्यातस्त्रिवर्गपरिचारणम् ।। ७५ ।। शूद्र गृहस्थको अपनी शक्तिके अनुसार तीनों वर्णोंका निरन्तर सब प्रकारसे आतिथ्य-सत्कार करना चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन वर्णोंकी परिचर्यामें रहना उसके लिये प्रधान धर्म बतलाया गया है ।। ७५ ।।

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो गृहस्थेषु विधीयते । तमहं वर्तयिष्यामि सर्वभूतहितं शुभम् ।। ७६ ।। प्रवृत्तिरूप धर्मका विधान गृहस्थोंके लिये किया गया है। वह सब प्राणियोंका हितकारी और शुभ है। अब मैं उसीका वर्णन करता हूँ ।। ७६ ।।

दातव्यमसकृच्छक्त्या यष्टव्यमसकृत् तथा । पुष्टिकर्मविधानं च कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।। ७७ ।। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको सदा अपनी शक्तिके अनुसार दान करना चाहिये। सदा यज्ञ करना चाहिये और सदा ही पुष्टिजनक कर्म करते रहना चाहिये ।।

धर्मेणार्थः समाहार्यो धर्मलब्धं त्रिधा धनम् । कर्तव्यं धर्मपरमं मानवेन प्रयत्नतः ।। ७८ ।। मनुष्यको धर्मके द्वारा धनका उपार्जन करना चाहिये। धर्मसे उपार्जित हुए धनके तीन भाग करने चाहिये और प्रयत्नपूर्वक धर्मप्रधान कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ।। ७८ ।।

एकेनांशेन धर्मार्थौ कर्तव्यौ भूतिमिच्छता । एकेनांशेन कामार्थ एकमंशं विवर्धयेत् ।। ७९ ।। अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको धनके उपर्युक्त तीन भागोंमेंसे एक भागके द्वारा धर्म और अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। दूसरे भागको उपभोगमें लगाना चाहिये और तीसरे अंशको बढ़ाना चाहिये (प्रवृत्तिधर्मका वर्णन किया गया है) ।। ७९ ।।

निवृत्तिलक्षणस्त्वन्यो धर्मो मोक्षाय तिष्ठति । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु मे देवि तत्त्वतः ।। ८० ।। इससे भिन्न निवृत्तिरूप धर्म है। वह मोक्षका साधन है। देवि! मैं यथार्थरूपसे उसका स्वरूप बताता हूँ, उसे सुनो ।। ८० ।।