महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1170, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वभूतदया धर्मो न चैकग्रामवासिता ।
आशापाशविमोक्षश्च शस्यते मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥ ८१ ॥
मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। यही उनका धर्म है। उन्हें सदा एक ही गाँवमें नहीं रहना चाहिये और अपने आशारूपी बन्धनोंको तोड़नेका प्रयत्न करना चाहिये। यही मुमुक्षुके लिये प्रशंसाकी बात है ॥ ८१ ॥
न कुट्यां नोदके सङ्गो न वाससि न चासने ।
न त्रिदण्डे न शयने नाग्नौ न शरणालये ॥ ८२ ॥
मोक्षाभिलाषी पुरुषको न तो कुटीमें आसक्ति रखनी चाहिये न जलमें, न वस्त्रमें, न आसनमें; न त्रिदण्डमें, न शय्यामें, न अग्निमें और न किसी निवासस्थानमें ही आसक्त होना चाहिये ॥ ८२ ॥
अध्यात्मगतिचित्तो यस्तन्मनास्तत्परायणः ।
युक्तो योगं प्रति सदा प्रतिसंख्यानमेव च ॥ ८३ ॥
मुमुक्षुको अध्यात्मज्ञानका ही चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये। उसे उसीमें सदा स्थित रहना चाहिये। निरन्तर योगाभ्यासमें प्रवृत्त होकर तत्त्वका विचार करते रहना चाहिये ॥ ८३ ॥
वृक्षमूलपरो नित्यं शून्यागारनिवेशनः ।
नदीपुलिनशायी च नदीतीररतिश्च यः ॥ ८४ ॥
विमुक्तः सर्वसङ्गेषु स्नेहबन्धेषु च द्विजः ।
आत्मन्येवात्मनो भावं समासज्जैत वै द्विजः ॥ ८५ ॥
संन्यासी द्विजको उचित है कि वह सब प्रकारकी आसक्तियों और स्नेहबन्धनोंसे मुक्त होकर सर्वदा वृक्षके नीचे, सूने घरमें अथवा नदीके किनारे रहता हुआ अपने अन्तःकरणमें ही परमात्माका ध्यान करे ॥ ८४-८५ ॥
स्थाणुभूतो निराहारो मोक्षदृष्टेन कर्मणा ।
परिव्रजेति यो युक्तस्तस्य धर्मः सनातनः ॥ ८६ ॥
जो युक्तचित्त होकर संन्यासी होता है और मोक्षोपयोगी कर्म श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदिके द्वारा समय व्यतीत करता हुआ निराहार (विषयसेवनसे रहित) और ठूंठे काठकी भाँति स्थिर रहता है, उसको सनातन धर्मका मोक्षरूप धर्म प्राप्त होता है ॥ ८६ ॥
न चैकत्र समासक्तो न चैकग्रामगोचरः ।
मुक्तो ह्यटति निर्मुक्तो न चैकपुलिनेशयः ॥ ८७ ॥
संन्यासी किसी एक स्थानमें आसक्ति न रखे, एक ही ग्राममें न रहे तथा किसी एक ही किनारेपर सर्वदा शयन न करे। उसे सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरना चाहिये ॥ ८७ ॥
एष मोक्षविदां धर्मो वेदोक्तः सत्पथः सताम् ।