महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1172, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्णन कीजिये ॥ ९४ ॥
श्रीभगवानुवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि मुनिधर्ममनुत्तमम् । यं कृत्वा मुनयो यान्ति सिद्धिं स्वतपसा शुभे ॥ ९५ ॥ श्रीभगवान् शिव बोले— शुभे! तुम्हारे इस प्रश्नसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब मैं मुनियोंके सर्वोत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, जिसका पालन करके वे अपनी तपस्याके द्वारा परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं ॥
फेनपानामृषीणां यो धर्मो धर्मविदां सताम् । तन्मे शृणु महाभागे धर्मज्ञे धर्ममादितः ॥ ९६ ॥ महाभागे! धर्मज्ञे! सबसे पहले धर्मवेत्ता साधुपुरुष फेनप ऋषियोंका जो धर्म है, उसीका मुझसे वर्णन सुनो ॥
उञ्छन्ति सततं ये ते ब्राह्म्यं फेनोत्करं शुभम् । अमृतं ब्रह्मणा पीतमध्वरे प्रसृतं दिवि ॥ ९७ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने यज्ञ करते समय जिसका पान किया तथा जो स्वर्गमें फैला हुआ है, वह अमृत (ब्रह्माजीके द्वारा पीया गया इसलिये) ब्राह्म कहलाता है। उसके फेनको जो थोड़ा-थोड़ा संग्रह करके सदा पान करते हैं (और उसीके आधारपर जीवन-निर्वाह करके तपस्यामें लगे रहते हैं,) वे फेनप* कहलाते हैं ॥ ९७ ॥
एष तेषां विशुद्धानां फेनपानां तपोधने । धर्मचर्याकृतो मार्गो बालखिल्यगणैः शृणु ॥ ९८ ॥ तपोधने! यह धर्माचरणका मार्ग उन विशुद्ध फेनप महात्माओंका ही मार्ग है। अब बालखिल्य नामवाले ऋषिगणोंद्वारा जो धर्मका मार्ग बताया गया है, उसको सुनो ॥ ९८ ॥
वालखिल्यास्तपःसिद्धा मुनयः सूर्यमण्डले । उञ्छे तिष्ठन्ति धर्मज्ञाः शाकुनीं वृत्तिमास्थिताः ॥ ९९ ॥ वालखिल्यगण तपस्यासे सिद्ध हुए मुनि हैं। वे सब धर्मोंके ज्ञाता हैं और सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं। वहाँ वे उञ्छवृत्तिका आश्रय ले पक्षियोंकी भाँति एक-एक दाना बीनकर उसीसे जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ ९९ ॥
मृगनिर्मोकवसनाश्चीरवल्कलवाससः । निर्द्वन्द्वाःसत्पथं प्राप्ता वालखिल्यास्तपोधनाः ॥ १०० ॥ मृगछाला, चीर और वल्कल—ये ही उनके वस्त्र हैं। वे बालखिल्य शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, सन्मार्गपर चलनेवाले और तपस्याके धनी हैं ॥ १०० ॥
अङ्गुष्ठपर्वमात्रा ये भूत्वा स्वे स्वे व्यवस्थिताः । तपश्चरणमीहन्ते तेषां धर्मफलं महत् ॥ १०१ ॥