भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1173, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1173

उनमेंसे प्रत्येकका शरीर अंगूठेके सिरेके बराबर है। इतने लघुकाय होनेपर भी वे अपने-अपने कर्तव्यमें स्थित हो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके धर्मका फल महान् है ॥ १०१ ॥

ते सुरैः समतां यान्ति सुरकार्यार्थसिद्धये ।
द्योतयन्ति दिशः सर्वास्तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ १०२ ॥
वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उनके समान रूप धारण करते हैं। वे तपस्यासे सम्पूर्ण पापोंको दग्ध करके अपने तेजसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हैं ॥ १०२ ॥

ये त्वन्ये शुद्धमनसो दयाधर्मपरायणाः ।
सन्तश्चक्रचराः पुण्याः सोमलोकचराश्च ये ॥ १०३ ॥
पितृलोकसमीपस्थास्त उञ्छन्ति यथाविधि ।
इनके अतिरिक्त दूसरे भी बहुत-से शुद्धचित्त, दयाधर्मपरायण एवं पुण्यात्मा संत हैं, जिनमें कुछ चक्रचर (चक्रके समान विचरनेवाले), कुछ सोमलोकमें रहनेवाले तथा कुछ पितृलोकके निकट निवास करनेवाले हैं। ये सब शास्त्रीय विधिके अनुसार उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं ॥ १०३ ½ ॥

सम्प्राक्षालाश्मकुट्टाश्च दन्तोलूखलिकाश्च ते ॥ १०४ ॥
सोमपानां च देवानामूष्मपाणां तथैव च ।
उञ्छन्ति ये समीपस्थाः सदारा नियतेन्द्रियाः ॥ १०५ ॥
कोई ऋषि सम्प्रक्षाल³, कोई अश्मकुट्ट³ और कोई दन्तोलूखलिक³ हैं। ये लोग सोमप (चन्द्रमाकी किरणोंका पान करनेवाले) और ऊष्मप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) देवताओंके निकट रहकर अपनी स्त्रियों-सहित उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते और इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं ॥ १०४-१०५ ॥

तेषामग्निपरिस्पन्दः पितॄणां चार्चनं तथा ।
यज्ञानां चैव पञ्चानां यजनं धर्म उच्यते ॥ १०६ ॥
अग्निहोत्र, पितरोंका पूजन (श्राद्ध) और पंचमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान यह उनका मुख्य धर्म कहा जाता है ॥

एष चक्रचरैर्देवि देवलोकचरैर्द्विजैः ।
ऋषिधर्मः सदा चीर्णो योऽन्यस्तमपि मे शृणु ॥ १०७ ॥
देवि! चक्रकी तरह विचरनेवाले और देवलोकमें निवास करनेवाले पूर्वोक्त ब्राह्मणोंने इस ऋषिधर्मका सदा ही अनुष्ठान किया है। इसके अतिरिक्त दूसरा भी जो ऋषियोंका धर्म है, उसे मुझसे सुनो ॥ १०७ ॥

सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः ।
कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ॥ १०८ ॥