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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1174, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1174

सभी आर्षधर्मोंमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। फिर काम

और क्रोधको भी जीतना चाहिये। ऐसा मेरा मत है ।। १०८ ।।

अग्निहोत्रपरिस्पन्दो धर्मरात्रिसमासनम् ।

सोमयज्ञाभ्यनुज्ञानं पञ्चमी यज्ञदक्षिणा ।। १०९ ।।

प्रत्येक ऋषिके लिये अग्निहोत्रका सम्पादन, धर्मसत्रमें स्थिति, सोमयज्ञका अनुष्ठान,

यज्ञविधिका ज्ञान और यज्ञमें दक्षिणा देना-इन पाँच कर्मोंका विधान आवश्यक

है ।। १०९ ।।

नित्यं यज्ञक्रिया धर्मः पितृदेवार्चने रतिः ।

सर्वातिथ्यं च कर्तव्यमन्नेनोज्छार्जितेन वै ।। ११० ।।

नित्य यज्ञका अनुष्ठान और धर्मका पालन करना चाहिये। देवपूजा और श्राद्धमें प्रीति

रखना चाहिये। उञ्छवृत्तिसे उपार्जित किये हुए अन्नके द्वारा सबका आतिथ्य-सत्कार करना

ऋषियोंका परम कर्तव्य है ।।

निवृत्तिरुपभोगेषु गोरसानां शमे रतिः ।

स्थण्डिले शयने योगः शाकपर्णनिषेवणम् ।। १११ ।।

फलमूलाशनं वायुरापः शैवलभक्षणम् ।

ऋषीणां नियमा ह्येते यैर्जयन्त्यजितां गतिम् ।। ११२ ।।

विषयभोगोंसे निवृत्त रहना, गोरसका आहार करना, शमके साधनमें प्रेम रखना, खुले

मैदान चबूतरेपर सोना, योगका अभ्यास करना, साग-पातका सेवन करना, फल-मूल

खाकर रहना, वायु, जल और सेवारका आहार करना-ये ऋषियोंके नियम हैं। इनका

पालन करनेसे वे अजित - सर्वश्रेष्ठ गतिको प्राप्त करते हैं ।।

विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।

अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ।। ११३ ।।

अतिथिं काङ्क्षमाणो वै शेषान्नकृतभोजनः ।

सत्यधर्मरतः शान्तो मुनिधर्मेण युज्यते ।। ११४ ।।

न स्तम्भी न च मानी स्यान्नाप्रसन्नो न विस्मितः ।

मित्रामित्रसमो मैत्रो यः स धर्मविदुत्तमः ।। ११५ ।।

जब गृहस्थोंके यहाँ रसोईघरका धुआँ निकलना बंद हो जाय, मूसलसे धान कूटनेकी

आवाज न आये-सन्नाटा छाया रहे, चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर

चुकें, बर्तनोंका इधर-उधर ले जाया जाना रुक जाय और भिक्षुक भीख माँगकर लौट गये

हों, ऐसे समयतक ऋषिको अतिथियोंकी बाट जोहनी चाहिये और उसके बचे-खुचे अन्नको

स्वयं ग्रहण करना चाहिये। ऐसा करनेसे सत्यधर्ममें अनुराग रखनेवाला शान्त पुरुष

मुनिधर्मसे युक्त होता है अर्थात् उसे मुनिधर्मके पालनका फल मिलता है। जिसे गर्व और

अभिमान नहीं है, जो अप्रसन्न और विस्मित नहीं होता, शत्रु और मित्रको समान समझता

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