महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1176, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा
उमोवाच
देशेषु रमणीयेषु नदीनां निर्झरेषु च ।
स्रवन्तीनां निकुञ्जेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १ ॥
देशेषु च पवित्रेषु फलवत्सु समाहिताः ।
मूलवत्सु च मेध्येषु वसन्ति नियतव्रताः ॥ २ ॥
**पार्वतीने कहा—**भगवन्! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल-मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं ॥ १-२ ॥
तेषामपि विधिं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ।
वानप्रस्थेषु देवेश स्वशरीरोपजीविषु ॥ ३ ॥
कल्याणकारी देवेश्वर! वानप्रस्थी महात्मा अपने शरीरको ही कष्ट पहुँचाकर जीवन-निर्वाह करते हैं; अतः उनके पालन करनेयोग्य जो पवित्र कर्तव्य या नियम है, उसीको मैं सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
वानप्रस्थेषु यो धर्मस्तं मे शृणु समाहिता ।
श्रुत्वा चैकमना देवि धर्मबुद्धिपरा भव ॥ ४ ॥
**भगवान् महेश्वरने कहा—**देवि! (गृहस्थ एवं) वानप्रस्थोंका जो धर्म है, उसको मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो और सुनकर एकचित्त हो अपनी बुद्धिको धर्ममें लगाओ ॥ ४ ॥
संसिद्धैर्नियमैः सद्भिर्वनवासमुपागतैः ।
वानप्रस्थैरिदं कर्म कर्तव्यं शृणु यादृशम् ॥ ५ ॥
नियमोंका पालन करके सिद्ध हुए वनवासी साधु वानप्रस्थोंको यह कर्म करना चाहिये। कैसा कर्म? यह बताता हूँ, सुनो ॥ ५ ॥
(भूत्वा पूर्वं गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च ।
कलत्रकार्यं संतृप्य कारणात् संत्यजेद् गृहम् ॥
मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन-द्वारा पितरोंके ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ॥
अवस्थाप्य मनो धृत्या व्यवसायपुरस्सरः ।