महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1177, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्द्वन्द्वो वा सदारो वा वनवासाय सव्रजेत् ॥ मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्वन्द्व (एकाकी) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ।।
देशाः परमपुण्या ये नदीवनसमन्विताः । अबोधमुक्ताः प्रायेण तीर्थायतनसंयुताः ॥ तत्र गत्वा विधिं ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद् यथाक्रमम् । दीक्षितश्चैकमना भूत्वा परिचर्यां समाचरेत् ॥ नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं। उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमशः ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात् एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ।।
कल्योत्थानं च शौचं च सर्वदेवप्रणामनम् । शकृदालेपनं काये त्यक्तदोषप्रमादता ॥ सायम्प्रातश्चाभिषेकं चाग्निहोत्रं यथाविधि । काले शौचं च कार्यं च जटावल्कलधारणम् ॥ सततं वनचर्या च समित्कुसुमकारणात् । नीवाराग्रयणं काले शाकमूलोपचायनम् ॥ सदायतनशौचं च तस्य धर्माय चेष्यते । सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रातःकाल स्नान एवं विधिवत् अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटिप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म (नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना—आदि कार्य वानप्रस्थ मुनिके लिये अभीष्ट है। इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ।।
अतिथीनामाभिमुख्यं तत्परत्वं च सर्वदा ॥ पाद्यासनाभ्यां सम्पूज्य तथाहारनिमन्त्रणम् । अग्राम्यपचनं काले पितृदेवार्चनं तथा ॥ पश्चादतिथिसत्कारस्तस्य धर्माः सनातनाः । पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे। पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे। समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों। उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे। तत्पश्चात् अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ।।