भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1179, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1179

मौसममें रातको जलके भीतर बैठना या खड़े रहना, बरसातमें खुले मैदानमें सोना और ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्निका सेवन करना चाहिये ।। १० ।। अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शैवलोत्तरभोजनैः । अश्मकुट्टैस्तथा दान्तैः सम्प्रक्षालैस्तथापरैः ।। ११ ।। वे वायु अथवा जल पीकर रहें। सेवारका भोजन करें। पत्थरसे अन्न या फलको कूँचकर खायँ अथवा दाँतोंसे चबाकर ही भक्षण करें। सम्प्रक्षालके नियमसे रहें अर्थात् दूसरे दिनके लिये आहार संग्रह करके न रखें ।। चीरवल्कलसंवीतैर्मृगचर्मनिवासिभिः । कार्या यात्रा यथाकालं यथाधर्मं यथाविधि ।। १२ ।। अधोवस्त्रकी जगह चीर और वल्कल पहनें, उत्तरीयके स्थानमें मृगछालेसे ही अपने अंगोंको आच्छादित करें। उन्हें समयके अनुसार धर्मके उद्देश्यसे विधिपूर्वक तीर्थ आदि स्थानोंकी ही यात्रा करनी चाहिये ।। १२ ।। वननित्यैर्वनचरैर्वनस्थैर्वनगोचरैः । वनं गुरुमिवासाद्य वस्तव्यं वनजीविभिः ।। १३ ।। वानप्रस्थको सदा वनमें ही रहना, वनमें ही विचरना, वनमें ही ठहरना, वनके ही मार्गपर चलना और गुरुकी भाँति वनकी शरण लेकर वनमें ही जीवन-निर्वाह करना चाहिये ।। १३ ।। तेषां होमक्रिया धर्मः पञ्चयज्ञनिषेवणम् । भागं च पञ्चयज्ञस्य वेदोक्तस्यानुपालनम् ।। १४ ।। प्रतिदिन अग्निहोत्र और पंचमहायज्ञोंका सेवन वानप्रस्थोंका धर्म है। उन्हें विभागपूर्वक वेदोक्त पंच-यज्ञोंका निरन्तर पालन करना चाहिये ।। १४ ।। अष्टमीयज्ञपरता चातुर्मास्यनिषेवणम् । पौर्णमासादयो यज्ञा नित्ययज्ञस्तथैव च ।। १५ ।। अष्टमी तिथिको होनेवाले अष्टका श्राद्धरूप यज्ञमें तत्पर रहना, चातुर्मास्य व्रतका सेवन करना, पौर्णमास और दर्शादि यज्ञ तथा नित्ययज्ञका अनुष्ठान करना वानप्रस्थ मुनिका धर्म है ।। १५ ।। विमुक्ता दारसंयोगैर्विमुक्ताः सर्वसंकरैः । विमुक्ताः सर्वपापैश्च चरन्ति मुनयो वने ।। १६ ।। वानप्रस्थ मुनि स्त्री-समागम, सब प्रकारके संकर तथा सम्पूर्ण पापोंसे दूर रहकर वनमें विचरते रहते हैं ।। १६ ।। स्रुग्भाण्डपरमा नित्यं त्रेताग्निशरणाः सदा । सन्तः सत्पथनित्या ये ते यान्ति परमां गतिम् ।। १७ ।।