महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1180, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्रुक्-स्रुवा आदि यज्ञपात्र ही उनके लिये उत्तम उपकरण हैं। वे सदा आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियोंकी शरण लेकर सदा उन्हींकी परिचर्यामें लगे रहते हैं और नित्य सन्मार्गपर चलते हैं। इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे श्रेष्ठ पुरुष परमगतिको प्राप्त होते हैं।। १७ ।।
ब्रह्मलोकं महापुण्यं सोमलोकं च शाश्वतम् ।
गच्छन्ति मुनयः सिद्धाः सत्यधर्मव्यपाश्रयाः ॥ १८ ॥
वे मुनि सत्यधर्मका आश्रय लेनेवाले और सिद्ध होते हैं, अतः महान् पुण्यमय ब्रह्मलोक तथा सनातन सोमलोकमें जाते हैं ।। १८ ।।
एष धर्मो मया देवि वानप्रस्थाश्रितः शुभः ।
विस्तरेणाथ सम्पन्नो यथास्थूलमुदाहृतः ॥ १९ ॥
देवि! यह मैंने तुम्हारे निकट विस्तारयुक्त एवं मंगलमय वानप्रस्थधर्मका स्थूलभावसे वर्णन किया है ।।
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश सर्वभूतनमस्कृत ।
यो धर्मो मुनिसंघस्य सिद्धिवादेषु तं वद ॥ २० ॥
उमादेवी बोलीं— भगवन्! सर्वभूतेश्वर! समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित महेश्वर! ज्ञानगोष्ठियोंमें मुनि-समुदायका जो धर्म निश्चित किया गया है, उसे बताइये ।।
सिद्धिवादेषु संसिद्धास्तथा वननिवासिनः ।
स्वैरिणो दारसंयुक्तास्तेषां धर्मः कथं स्मृतः ॥ २१ ॥
ज्ञानगोष्ठियोंमें जो सम्यक् सिद्ध बताये गये हैं, वे वनवासी मुनि कोई तो एकाकी ही स्वच्छन्द विचरते हैं, कोई पत्नीके साथ रहते हैं। उनका धर्म कैसा माना गया है? ।। २१ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
स्वैरिणस्तपसा देवि सर्वे दारविहारिणः ।
तेषां मौण्ड्यं कषायञ्च वासे रात्रिश्च कारणम् ॥ २२ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! सभी वानप्रस्थ तपस्यामें संलग्न रहते हैं, उनमेंसे कुछ तो स्वच्छन्द विचरनेवाले होते हैं (स्त्रीको साथ नहीं रखते) और कुछ अपनी-अपनी स्त्रीके साथ रहते हैं। स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनि सिर मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहनते हैं; (उनका कोई एक स्थान नहीं होता) किंतु जो स्त्रीके साथ रहते हैं, वे रात्रिको अपने आश्रममें ही ठहरते हैं ।। २२ ।।
त्रिकालमभिषेकश्च होत्रं त्वृषिकृतं महत् ।
समाधिसत्पथस्थानं यथोद्दिष्टनिषेवणम् ॥ २३ ॥