भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1181, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1181

दोनों प्रकारके ही ऋषियोंका यह महान् कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन तीनों समय जलमें स्नान करें और अग्निमें आहुति डालें। समाधि लगावें, सन्मार्गपर चलें और शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करें॥ २३ ॥

ये च ते पूर्वकथिता धर्मास्ते वनवासिनाम्।
यदि सेवन्ति धर्मांस्तानाप्नुवन्ति तपःफलम् ॥ २४ ॥
पहले जो तुम्हारे समक्ष वनवासियोंके धर्म बताये गये हैं, उन सबका यदि वे पालन करते हैं तो उन्हें अपनी तपस्याका पूर्ण फल मिलता है॥ २४ ॥

ये च दम्पतिधर्माणः स्वदारनियतेन्द्रियाः।
चरन्ति विधिवद् दृष्टं तदनुकालाभिगामिनः ॥ २५ ॥
तेषामृषिकृतो धर्मो धर्मिणामुपपद्यते।
न कामकारात् कामोऽन्यः संसेव्यो धर्मदर्शिभिः ॥ २६ ॥
जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्मका पालन करते हुए स्त्रीको अपने साथ रखते हैं, उसके साथ ही इन्द्रियसंयम-पूर्वक वेदविहित धर्मका आचरण करते हैं और केवल ऋतुकालमें ही स्त्री-समागम करते हैं, उन धर्मात्माओंको ऋषियोंके बताये हुए धर्मोंके पालन करनेका फल मिलता है। धर्मदर्शी पुरुषोंको कामनावश किसी भोगका सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २५-२६॥

सर्वभूतेषु यः सम्यग् ददात्यभयदक्षिणाम्।
हिंसादोषविमुक्तात्मा स वै धर्मेण युज्यते ॥ २७ ॥
जो हिंसादोषसे मुक्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसीको धर्मका फल प्राप्त होता है॥ २७ ॥

सर्वभूतानुकम्पी यः सर्वभूतार्जवव्रतः।
सर्वभूतात्मभूतश्च स वै धर्मेण युज्यते ॥ २८ ॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, सबके साथ सरलताका बर्ताव करता और समस्त भूतोंको आत्मभावसे देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है ॥ २८ ॥

सर्ववेदेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते ॥ २९ ॥
चारों वेदोंमें निष्णात होना और सब जीवोंके प्रति सरलताका बर्ताव करना—ये दोनों एक समान समझे जाते हैं अथवा सरलताका ही महत्त्व अधिक माना जाता है॥

आर्जवं धर्ममित्याहुरधर्मो जिह्म उच्यते।
आर्जवेनेह संयुक्तो नरो धर्मेण युज्यते ॥ ३० ॥
सरलताको धर्म कहते हैं और कुटिलताको अधर्म। सरलभावसे युक्त मनुष्य ही यहाँ धर्मके फलका भागी होता है॥ ३० ॥

आर्जवे तु रतो नित्यं वसत्यमरसंनिधौ।