महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1182, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मादार्जवयुक्तः स्याद् य इच्छेद् धर्ममात्मनः ॥ ३१ ॥
जो सदा सरल बर्तावमें तत्पर रहता है, वह देवताओंके समीप निवास करता है। इसलिये जो अपने धर्मका फल पाना चाहता हो, उसे सरलतापूर्ण बर्तावसे युक्त होना चाहिये ॥ ३१ ॥
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसकः ।
धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते ॥ ३२ ॥
क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है ॥ ३२ ॥
व्यपेततन्द्रिर्धर्मात्मा शक्त्या सत्पथमाश्रितः ।
चारित्रपरमो बुद्धो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३३ ॥
जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३३ ॥
उमोवाच
(एषां यायावराणां तु धर्ममिच्छामि मानद ।
कृपया परयाऽऽविष्टस्तन्मे ब्रूहि महेश्वर ॥
**उमादेवी बोलीं—**सबको मान देनेवाले महेश्वर! मैं यायावरोंके धर्मको सुनना चाहती हूँ, आप महान् अनुग्रह करके मुझे यह बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
धर्मं यायावराणां त्वं शृणु भामिनि तत्परा ॥
व्रतोपवासशुद्धाङ्गास्तीर्थस्नानपरायणाः ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**भामिनि! तुम तत्पर होकर यायावरोंके धर्म सुनो। व्रत और उपवाससे उनके अंग-प्रत्यंग शुद्ध हो जाते हैं तथा वे तीर्थ-स्नानमें तत्पर रहते हैं ॥
धृतिमन्तः क्षमायुक्ताः सत्यव्रतपरायणाः ॥
पक्षमासोपवासैश्च कर्शिता धर्मदर्शिनः ।
उनमें धैर्य और क्षमाका भाव होता है। वे सत्यव्रत-परायण होकर एक-एक पक्ष और एक-एक मासका उपवास करके अत्यन्त दुर्बल हो जाते हैं। उनकी दृष्टि सदा धर्मपर ही रहती है ॥
वर्षैः शीतातपैरैव कुर्वन्तः परमं तपः ॥
कालयोगेन गच्छन्ति शक्रलोकं शुचिस्मिते ।
पवित्र मुसकानवाली देवि! वे सर्दी, गर्मी और वर्षाका कष्ट सहन करते हुए बड़ी भारी तपस्या करते हैं और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥
तत्र ते भोगसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विताः ॥