महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1183, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिव्यभूषणसंयुक्ता विमानवरसंयुताः ।
विचरन्ति यथाकामं दिव्यस्त्रीगणसंयुताः ॥
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
वहाँ भी नाना प्रकारके भोगोंसे संयुक्त और दिव्यगन्धसे सम्पन्न हो दिव्य आभूषण धारण करके सुन्दर विमानोंपर बैठते और दिव्यांगनाओंके साथ इच्छानुसार विहार करते हैं। देवि! यह सब यायावरोंका धर्म मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
उमोवाच
तेषां चक्रचराणां च धर्ममिच्छामि वै प्रभो ॥
**उमाने कहा—**प्रभो! वानप्रस्थ ऋषियोंमें जो चक्रचर (छकड़ेसे यात्रा करनेवाले) हैं उनके धर्मको मैं जानना चाहती हूँ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
एतत् ते कथयिष्यामि शृणु शाकटिकं शुभे ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शुभे! यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। चक्रचारी या शाकटिक मुनियोंका धर्म सुनो ॥
संवहन्तो धुरं दारैः शकटानां तु सर्वदा ।
प्रार्थयन्ते यथाकालं शकटैर्भैक्षचर्यया ॥
तपोऽर्जनपरा धीरास्तपसा क्षीणकल्मषाः ।
पर्यटन्तो दिशः सर्वाः कामक्रोधविवर्जिताः ॥
वे अपनी स्त्रियोंके साथ सदा छकड़ोंके बोझ ढोते हुए यथासमय छकड़ोंद्वारा ही जाकर भिक्षाकी याचना करते हैं। सदा तपस्याके उपार्जनमें लगे रहते हैं। वे धीर मुनि तपस्याद्वारा अपने सारे पापोंका नाश कर डालते हैं तथा काम और क्रोधसे रहित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें पर्यटन करते हैं ॥
तेनैव कालयोगेन त्रिदिवं यान्ति शोभने ।
तत्र प्रमुदिता भोगैर्विचरन्ति यथासुखम् ॥
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
शोभने! उसी जीवनचर्यासे रहित हुए वे कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जाते हैं और वहाँ दिव्य भोगोंसे आनन्दित हो अपने मौजसे घूमते-फिरते हैं। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो ॥
उमोवाच
वैखानसानां वै धर्मं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
**उमाने कहा—**प्रभो! अब मैं वैखानसोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ॥