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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1184, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1184

श्रीमहेश्वर उवाच

ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्थाः शुभेक्षणे ।

तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्तः स्वतेजसा ।।

सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तपः ।

श्रीमहेश्वरने कहा—शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर

तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते

हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।।

अश्मकुट्टास्तथान्ये च दन्तोलूखलिनस्तथा ।

शीर्णपर्णाशिनश्चान्ये उञ्छवृत्तास्तथा परे ।।

कपोतवृत्तयश्चान्ये कापोतीं वृत्तिमास्थिताः ।

पशुप्रचारनिरताः फेनपाश्च तथा परे ।।

मृगवन्मृगचर्यायां संचरन्ति तथा परे ।

उनमेंसे कुछ लोग अश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं।

दूसरे दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे

उञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके

समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही

चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य

बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।।

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च निराहारास्तथैव च ।।

केचिच्चरन्ति सद्धिष्णोः पादपूजनमुत्तमम् ।

कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही

निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते

हैं ।।

संचरन्ति तपो घोरं व्याधिमृत्युविवर्जिताः ।।

स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यशः ।।

इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसंचयाः ।

अमरैः समतां यान्ति देववद्भोगसंयुताः ।।

वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन

मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य

भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।।

वराप्सरोभिः संयुक्ताश्चिरकालमनिन्दिते ।

एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।