महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्रीमहेश्वर उवाच
ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्थाः शुभेक्षणे ।
तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्तः स्वतेजसा ।।
सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तपः ।
श्रीमहेश्वरने कहा—शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर
तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते
हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।।
अश्मकुट्टास्तथान्ये च दन्तोलूखलिनस्तथा ।
शीर्णपर्णाशिनश्चान्ये उञ्छवृत्तास्तथा परे ।।
कपोतवृत्तयश्चान्ये कापोतीं वृत्तिमास्थिताः ।
पशुप्रचारनिरताः फेनपाश्च तथा परे ।।
मृगवन्मृगचर्यायां संचरन्ति तथा परे ।
उनमेंसे कुछ लोग अश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं।
दूसरे दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे
उञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके
समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही
चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य
बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।।
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च निराहारास्तथैव च ।।
केचिच्चरन्ति सद्धिष्णोः पादपूजनमुत्तमम् ।
कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही
निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते
हैं ।।
संचरन्ति तपो घोरं व्याधिमृत्युविवर्जिताः ।।
स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यशः ।।
इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसंचयाः ।
अमरैः समतां यान्ति देववद्भोगसंयुताः ।।
वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन
मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य
भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।।
वराप्सरोभिः संयुक्ताश्चिरकालमनिन्दिते ।
एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।
सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराओंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् श्रोतुमिच्छामि वालखिल्यांस्तपोधनान् ।। उमाने कहा— भगवन्! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
धर्मचर्यां तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु ।। मृगनिर्मोकवसना निर्द्वन्द्वास्ते तपोधनः । अङ्गुष्ठमात्राः सुश्रोणि तेष्वेवाङ्गेषु संयुताः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं।। उद्यन्तं सततं सूर्य स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः । भास्करस्येव किरणैः सहसा यान्ति नित्यदा ।। द्योतयन्तो दिशः सर्वा धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ।। वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।। तेष्वेव निर्मलं सत्यं लोकार्थं तु प्रतिष्ठितम् । लोकोऽयं धार्यते देवि तेषामेव तपोबलात् ।। महात्मनां तु तपसा सत्येन च शुचिस्मिते । क्षमया च महाभागे भूतानां संस्थितिं विदुः ।। उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत् टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।। प्रजार्थमपि लोकार्थं महद्भिः क्रियते तपः । तपसा प्राप्यते सर्वं तपसा प्राप्यते फलम् ।। दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत् ।।)
महान् पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।।
उमोवाच
आश्रमाभिरता देव तापसा ये तपोधनाः । दीप्तिमन्तः कया चैव चर्ययाथ भवन्ति ते ।। ३४ ।। उमाने पूछा—देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं? ।। ३४ ।। राजानो राजपुत्राश्च निर्धना ये महाधनाः । कर्मणा केन भगवन् प्राप्नुवन्ति महाफलम् ।। ३५ ।। भगवन्! जो राजा या राजकुमार हैं अथवा जो निर्धन या महाधनी हैं, वे किस कर्मके प्रभावसे महान् फलके भागी होते हैं? ।। ३५ ।। नित्यं स्थानमुपागम्य दिव्यचन्दनभूषिताः । केन वा कर्मणा देव भवन्ति वनगोचराः ।। ३६ ।। देव! वनवासी मुनि किस कर्मसे दिव्य स्थानको पाकर दिव्य चन्दनसे विभूषित होते हैं? ।। ३६ ।। एतन्मे संशयं देव तपश्चर्याऽऽश्रितं शुभम् । शंस सर्वमशेषेण त्र्यक्ष त्रिपुरनाशन ।। ३७ ।। देव! त्रिपुरनाशन त्रिलोचन! तपस्याके आश्रित शुभ फलके विषयमें मेरा यही संदेह है। इस सारे संदेहका उत्तर आप पूर्णरूपसे प्रदान करें ।। ३७ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
उपवासव्रतैर्दान्ता ह्यहिंस्राः सत्यवादिनः । संसिद्धाः प्रेत्य गन्धर्वैः सह मोदन्त्यनामयाः ।। ३८ ।। श्रीमहेश्वरने कहा—जो उपवास व्रतसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, हिंसारहित और सत्यवादी होकर सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, वे मृत्युके पश्चात् रोग-शोकसे रहित हो गन्धर्वोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ।। ३८ ।। मण्डूकयोगशयनो यथान्यायं यथाविधि । दीक्षां चरति धर्मात्मा स नागैः सह मोदते ।। ३९ ।। जो धर्मात्मा पुरुष न्यायानुसार विधिपूर्वक हठयोग-प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अनुसार शयन करता और यज्ञकी दीक्षा लेता है, वह नागलोकमें नागोंके साथ सुख भोगता है ।। ३९ ।। शष्पं मृगमुखोच्छिष्टं यो मृगैः सह भक्षति ।
दीक्षितो वै मुदा युक्तः स गच्छत्यमरावतीम् ।। ४० ।। जो मृगचर्या-व्रतकी दीक्षा ले मृगोंके मुखसे उच्छिष्ट हुई घासको प्रसन्नतापूर्वक उन्हींके साथ रहकर भक्षण करता है, वह मृत्युके पश्चात् अमरावतीपुरीमें जाता है ।। शैवालं शीर्णपर्णं वा तद्व्रती यो निषेवते । शीतयोगवहो नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् ।। ४१ ।। जो व्रतधारी वानप्रस्थ मुनि सेवार अथवा जीर्ण-शीर्ण पत्तेका आहार करता तथा जाड़ेमें प्रतिदिन शीतका कष्ट सहन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ।। ४१ ।। वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा फलमूलाशनोऽपि वा । यक्षेष्वैश्वर्यमाधाय मोदतेऽप्सरसां गणैः ।। ४२ ।। जो वायु, जल, फल अथवा मूल खाकर रहता है, वह यक्षोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ४२ ।। अग्नियोगवहो ग्रीष्मे विधिदृष्टेन कर्मणा । चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि राजा भवति पार्थिवः ।। ४३ ।। जो गर्मीमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पंचाग्नि सेवन करता है, वह बारह वर्षोंतक उक्त व्रतका पालन करके जन्मान्तरमें भूमण्डलका राजा होता है ।। ४३ ।। आहारनियमं कृत्वा मुनिर्द्वादशवार्षिकम् । मरुं संसाध्य यत्नेन राजा भवति पार्थिवः ।। ४४ ।। जो मुनि बारह वर्षोंतक आहारका संयम करता हुआ यत्नपूर्वक मरु-साधना करके अर्थात् जलको भी त्यागकर तप करता है, वह भी इस पृथ्वीका राजा होता है ।। ४४ ।। स्थण्डिले शुद्धमाकाशं परिगृह्य समन्ततः । प्रविश्य च मुदा युक्तो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।। ४५ ।। देहं चानशने त्यक्त्वा स स्वर्गे सुखमेधते । जो वानप्रस्थ अपने चारों ओर विशुद्ध आकाशको ग्रहण करता हुआ खुले मैदानमें वेदीपर सोता और बारह वर्षोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक व्रतकी दीक्षा ले उपवास करके अपना शरीर त्याग देता है, वह स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ।। ४५ १/२ ।। स्थण्डिलस्य फलान्याहुर्यानानि शयनानि च ।। ४६ ।। गृहाणि च महार्हाणि चन्द्रशुभ्राणि भामिनि । भामिनि! वेदीपर शयन करनेसे प्राप्त होनेवाले फल इस प्रकार बताये गये हैं—सवारी, शय्या और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल बहुमूल्य गृह ।। ४६ १/२ ।। आत्मानमुपजीवन् यो नियतो नियताशनः ।। ४७ ।। देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्गं समुपश्नुते ।
जो केवल अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ नियमपूर्वक रहता है और नियमित भोजन करता है अथवा अनशन व्रतका आश्रय ले शरीरको त्याग देता है, वह स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ४७ १/२ ॥
आत्मानमुपजीवन् दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ॥ ४८ ॥
त्यक्त्वा महार्णवे देहं वारुणं लोकमश्नुते ।
जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ बारह वर्षोंकी दीक्षा ले महासागरमें अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह वरुणलोकमें सुख भोगता है ॥ ४८ १/२ ॥
आत्मानमुपजीवन् दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ॥ ४९ ॥
अश्मना चरणौ भित्त्वा गुह्यकेषु स मोदते ।
साधयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥ ५० ॥
जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ निर्द्वन्द्व और परिग्रहशून्य हो बारह वर्षोंके लिये व्रतकी दीक्षा ले अन्तमें पत्थरसे अपने पैरोंको विदीर्ण करके स्वयं ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह गुह्यकलोकमें आनन्द भोगता है ॥ ४९-५० ॥
चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि दीक्षामेतां मनोगताम् ।
स्वर्गलोकमवाप्नोति देवैश्च सह मोदते ॥ ५१ ॥
जो बारह वर्षोंतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता और देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ॥ ५१ ॥
आत्मानमुपजीवन् यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
हुत्वाग्नौ देहमुत्सृज्य वह्निलोके महीयते ॥ ५२ ॥
जो बारह वर्षोंके लिये व्रत-पालनकी दीक्षा ले अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ अपने शरीरको अग्निमें होम देता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ५२ ॥
यस्तु देवि यथान्यायं दीक्षितो नियतो द्विजः ।
आत्मन्यात्मानमाधाय निर्ममो धर्मलालसः ॥ ५३ ॥
चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि दीक्षामेतां मनोगताम् ।
अरणीसहितं स्कन्धे बद्ध्वा गच्छत्यनावृतः ॥ ५४ ॥
वीराध्वानगतो नित्यं वीरासनरतस्तथा ।
वीरस्थायी च सततं स वीरगतिमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
देवि! जो ब्राह्मण नियमपूर्वक रहकर यथोचित रीतिसे वनवास-व्रतकी दीक्षा ले अपने मनको परमात्मचिन्तनमें लगाकर ममताशून्य और धर्मका अभिलाषी होकर बारह वर्षोंतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करके अरणी-सहित अग्निको वृक्षकी डालीमें बाँधकर अर्थात् अग्निका परित्याग करके अनावृत भावसे यात्रा करता है, सदा वीर मार्गसे चलता है, वीरासनपर बैठता है और वीरकी भाँति खड़ा होता है, वह वीरगतिको प्राप्त होता है ॥
स शक्रलोकगो नित्यं सर्वकामपुरस्कृतः ।
दिव्यपुष्पसमाकीर्णो दिव्यचन्दनभूषितः ॥ ५६ ॥ वह इन्द्रलोकमें जाकर सदा सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है। उसके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होती है तथा वह दिव्य चन्दनसे विभूषित होता है ॥ ५६ ॥
सुखं वसति धर्मात्मा दिवि देवगणैः सह । वीरलोकगतो नित्यं वीरयोगसहः सदा ॥ ५७ ॥ वह धर्मात्मा देवलोकमें देवताओंके साथ सुख-पूर्वक निवास करता है और निरन्तर वीरलोकमें रहकर वीरोंके साथ संयुक्त होता है ॥ ५७ ॥
सत्त्वस्थः सर्वमुत्सृज्य दीक्षितो नियतः शुचिः । वीराध्वानं प्रपद्येत यस्तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ५८ ॥ जो सब कुछ त्यागकर वनवासकी दीक्षा ले सत्त्वगुणमें स्थित नियमपरायण एवं पवित्र हो वीरपथका आश्रय लेता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं ॥ ५८ ॥
कामगेन विमानेन स वै चरति छन्दतः । शक्रलोकगतः श्रीमान् मोदते च निरामयः ॥ ५९ ॥ वह इन्द्रलोकमें जाकर नीरोग और दिव्य शोभासे सम्पन्न हो आनन्द भोगता है और इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वच्छन्द विचरता रहता है ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९६ १/३ श्लोक हैं)
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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन
उमोवाच
भगवन् भगनेत्रघ्न पूष्णो दन्तनिपातन ।
दक्षक्रतुहर त्र्यक्ष संशयो मे महानयम् ॥ १ ॥
पार्वतीजीने पूछा— भगदेवताकी आँख फोड़कर पूषाके दाँत तोड़ डालनेवाले दक्षयज्ञविध्वंसी भगवान् त्रिलोचन! मेरे मनमें यह एक महान् संशय है ॥ १ ॥
चातुर्वर्ण्यं भगवता पूर्वं सृष्टं स्वयम्भुवा ।
केन कर्मविपाकेन वैश्यो गच्छति शूद्रताम् ॥ २ ॥
भगवान् ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन चार वर्णोंकी सृष्टि की है, उनमेंसे वैश्य किस कर्मके परिणामसे शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है? ॥ २ ॥
वैश्यो वा क्षत्रियः केन द्विजो वा क्षत्रियो भवेत् ।
प्रतिलोमः कथं देव शक्यो धर्मो निवर्तितुम् ॥ ३ ॥
अथवा क्षत्रिय किस कर्मसे वैश्य होता है और ब्राह्मण किस कर्मसे क्षत्रिय हो जाता है? देव! प्रतिलोम धर्मको कैसे निवृत्त किया जा सकता है? ॥ ३ ॥
केन वा कर्मणा विप्रः शूद्रयोनौ प्रजायते ।
क्षत्रियः शूद्रतामेति केन वा कर्मणा विभो ॥ ४ ॥
प्रभो! कौन-सा कर्म करनेसे ब्राह्मण शूद्र-योनिमें जन्म लेता है अथवा किस कर्मसे क्षत्रिय शूद्र हो जाता है? ॥ ४ ॥
एतन्मे संशयं देव वद भूतपतेऽनघ ।
त्रयो वर्णाः प्रकृत्येह कथं ब्राह्मण्यमाप्नुयुः ॥ ५ ॥
देव! पापरहित भूतनाथ! मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय—इन तीन वर्णोंके लोग किस प्रकार स्वभावतः ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकते हैं? ॥ ५ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ब्राह्मण्यं देवि दुष्प्रापं निसर्गाद् ब्राह्मणः शुभे ।
क्षत्रियो वैश्यशूद्रौ वा निसर्गादिति मे मतिः ॥ ६ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। शुभे! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चारों वर्ण मेरे विचारसे नैसर्गिक (प्राकृतिक या स्वभावसिद्ध) हैं, ऐसा मेरा विचार है ॥ ६ ॥
कर्मणा दुष्कृतेनेह स्थानाद् भ्रश्यति वै द्विजः । ज्येष्ठं वर्णमनुप्राप्य तस्माद् रक्षेत् वै द्विजः ॥ ७ ॥ इतना अवश्य है कि यहाँ पापकर्म करनेसे द्विज अपने स्थानसे-अपनी महत्तासे नीचे गिर जाता है। अतः द्विजको उत्तम वर्णमें जन्म पाकर अपनी मर्यादाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ७ ॥
स्थितो ब्राह्मणधर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति । क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयं स गच्छति ॥ ८ ॥ यदि क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्राह्मण-धर्मका पालन करते हुए ब्राह्मणत्वका सहारा लेता है तो वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥
यस्तु विप्रत्वमुत्सृज्य क्षात्रं धर्मं निषेवते । ब्राह्मण्यात् स परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते ॥ ९ ॥ जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्वका त्याग करके क्षत्रिय-धर्मका सेवन करता है, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर क्षत्रिय योनिमें जन्म लेता है ॥ ९ ॥
वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रयः । ब्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमतिः सदा ॥ १० ॥ स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामियात् । स्वधर्मात् प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्वमाप्नुते ॥ ११ ॥ जो विप्र दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर लोभ और मोहके वशीभूत हो अपनी मन्दबुद्धिताके कारण वैश्यका कर्म करता है, वह वैश्ययोनिमें जन्म लेता है। अथवा यदि वैश्य शूद्रके कर्मको अपनाता है, तो वह भी शूद्रत्वको प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्मसे भ्रष्ट हुआ ब्राह्मण शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ १०-११ ॥
तत्रासौ निरयं प्राप्तो वर्णभ्रष्टो बहिष्कृतः । ब्रह्मलोकात् परिभ्रष्टः शूद्रः समुपजायते ॥ १२ ॥ ब्राह्मण-जातिका पुरुष शूद्र-कर्म करनेके कारण अपने वर्णसे भ्रष्ट होकर जातिसे बहिष्कृत हो जाता है और मृत्युके पश्चात् वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिसे वंचित होकर नरकमें पड़ता है। इसके बाद वह शूद्रकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ॥ १२ ॥
क्षत्रियो वा महाभागे वैश्यो वा धर्मचारिणि । स्वानि कर्माण्यपाहाय शूद्रकर्म निषेवते ॥ १३ ॥ स्वस्थानात् स परिभ्रष्टो वर्णसंकरतां गतः । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रत्वं याति तादृशः ॥ १४ ॥ महाभागे! धर्मचारिणि! क्षत्रिय अथवा वैश्य भी अपने-अपने कर्मोंको छोड़कर यदि शूद्रका काम करने लगता है तो वह अपनी जातिसे भ्रष्ट होकर वर्णसंकर हो जाता है और
दूसरे जन्ममें शूद्रकी योनिमें जन्म पाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य कोई भी क्यों न हो, वह शूद्रभावको प्राप्त होता है ।। १३-१४ ।।
यस्तु बुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवान् शुचिः । धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ।। १५ ।। जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।। १५ ।।
इदं चैवापरं देवि ब्रह्मणा समुदाहृतम् । अध्यात्मं नैष्ठिकं सद्भिर्धर्मकामैर्निषेव्यते ।। १६ ।। देवि! ब्रह्माजीने यह एक बात और बतायी है—धर्मकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको आजीवन अध्यात्म-तत्त्वका ही सेवन करना चाहिये ।। १६ ।।
उग्रान्नं गर्हितं देवि गणान्नं श्राद्धसूतकम् । दुष्टान्नं नैव भोक्तव्यं शूद्रान्नं नैव कर्हिचित् ।। १७ ।। देवि! उग्रस्वभावके मनुष्यका अन्न निन्दित माना गया है। किसी समुदायका, श्राद्धका, जननाशौचका, दुष्ट पुरुषका और शूद्रका अन्न भी निषिद्ध है—उसे कभी नहीं खाना चाहिये ।। १७ ।।
शूद्रान्नं गर्हितं देवि सदा देवैर्महात्मभिः । पितामहमुखोत्सृष्टं प्रमाणमिति मे मतिः ।। १८ ।। देवताओं और महात्मा पुरुषोंने शूद्रके अन्नकी सदा ही निन्दा की है। इस विषयमें पितामह ब्रह्माजीके श्रीमुखका वचन प्रमाण है, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १८ ।।
शूद्रान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विजः । आहिताग्निस्तथा यज्वा स शूद्रगतिभाग् भवेत् ।। १९ ।। जो ब्राह्मण पेटमें शूद्रका अन्न लिये मर जाता है, वह अग्निहोत्री अथवा यज्ञ करनेवाला ही क्यों न रहा हो, उसे शूद्रकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १९ ।।
तेन शूद्रान्नशेषेण ब्रह्मस्थानादपाकृतः । ब्राह्मणः शूद्रतामेति नास्ति तत्र विचारणा ।। २० ।। उदरमें शूद्रान्नका शेषभाग स्थित होनेके कारण ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे वंचित हो शूद्रभावको प्राप्त होता है; इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २० ।।
यस्यान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विजः । तां तां योनिं व्रजेद् विप्रो यस्यान्नमुपजीवति ।। २१ ।। उदरमें जिसके अन्नका अवशेष लेकर जो ब्राह्मण मृत्युको प्राप्त होता है, वह उसीकी योनिमें जाता है। जिसके अन्नसे जीवन-निर्वाह करता है, उसीकी योनिमें जन्म ग्रहण करता
है ।। २१ ।।
ब्राह्मणत्वं शुभं प्राप्य दुर्लभं योऽवमन्यते । अभोज्यान्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात् पतेत वै ।। २२ ।। जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर उसकी अवहेलना करता है और नहीं खानेयोग्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है ।। २२ ।।
सुरापो ब्रह्महा क्षुद्रचोरो भग्नव्रतोऽशुचिः । स्वाध्यायवर्जितः पापो लुब्धो नैकृतिकः शठः ।। २३ ।। अव्रती वृषलीभर्ता कुण्डाशी सोमविक्रयी । निहीनसेवी विप्रो हि पतति ब्रह्मयोनितः ।। २४ ।। शराबी, ब्रह्महत्यारा, नीच, चोर, व्रतभंग करनेवाला, अपवित्र, स्वाध्यायहीन, पापी, लोभी, कपटी, शठ, व्रतका पालन न करनेवाला, शूद्रजातिकी स्त्रीका स्वामी, कुण्डाशी (पतिके जीते-जी उत्पन्न किये हुए जारज पुत्रके घरमें खानेवाला अथवा पाकपात्रमें ही भोजन करनेवाला), सोमरस बेचनेवाला और नीचसेवी ब्राह्मण ब्राह्मणकी योनिसे भ्रष्ट हो जाता है ।। २३-२४ ।।
गुरुतल्पी गुरुद्रोही गुरुकुत्सारतिश्च यः । ब्रह्मविच्चापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनितः ।। २५ ।। जो गुरुकी शय्यापर सोनेवाला, गुरुद्रोही और गुरुनिन्दामें अनुरक्त है, वह ब्राह्मण वेदवेत्ता होनेपर भी ब्रह्मयोनिसे नीचे गिर जाता है ।। २५ ।।
एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा । शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत् ।। २६ ।। देवि! इन्हीं शुभ कर्मों और आचरणोंसे शूद्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त होता है और वैश्य क्षत्रियत्वको ।।
शूद्रकर्माणि सर्वाणि यथान्यायं यथाविधि । शुश्रूषां परिचर्यां च ज्येष्ठे वर्णे प्रयत्नतः ।। २७ ।। कुर्यादविमनाः शूद्रः सततं सत्पथे स्थितः । देवद्विजातिसत्कर्ता सर्वातिथ्यकृतव्रतः ।। २८ ।। ऋतुकालाभिगामी च नियतो नियताशनः । चोक्षंश्चोक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः ।। २९ ।। वृथामांसं न भुञ्जीत शूद्रो वैश्यत्वमृच्छति । शूद्र अपने सभी कर्मोंको न्यायानुसार विधिपूर्वक सम्पन्न करे। अपनेसे ज्येष्ठ वर्णकी सेवा और परिचर्यामें प्रयत्नपूर्वक लगा रहे। अपने कर्तव्यपालनसे कभी ऊबे नहीं। सदा सन्मार्गपर स्थित रहे। देवताओं और द्विजोंका सत्कार करे। सबके आतिथ्यका व्रत लिये रहे। ऋतुकालमें ही स्त्रीके साथ समागम करे। नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करे।
स्वयं शुद्ध रहकर शुद्ध पुरुषोंका ही अन्वेषण करे। अतिथि-सत्कार और कुटुम्बीजनोंके भोजनसे बचे हुए अन्नका ही आहार करे और मांस न खाय। इस नियमसे रहनेवाला शूद्र (मृत्युके पश्चात् पुण्यकर्मोंका फल भोगकर) वैश्ययोनिमें जन्म लेता है॥ ऋतवागनहंवादी निर्द्वन्द्वः शमकोविदः ॥ ३० ॥ यजते नित्ययज्ञैश्च स्वाध्यायपरमः शुचिः । दान्तो ब्राह्मणसत्कर्ता सर्ववर्णबुभूषकः ॥ ३१ ॥ गृहस्थव्रतमातिष्ठन् द्विकालकृतभोजनः । शेषाशी विजिताहारो निष्कामो निरहंवदः ॥ ३२ ॥ अग्निहोत्रमुपासंश्च जुह्वानश्च यथाविधि । सर्वातिथ्यमुपातिष्ठन् शेषान्नकृतभोजनः ॥ ३३ ॥ त्रेताग्निमन्त्रविहितो वैश्यो भवति वै द्विजः । स वैश्यः क्षत्रियकुले शुचौ महति जायते ॥ ३४ ॥ वैश्य सत्यवादी, अहंकारशून्य, निर्द्वन्द्व, शान्तिके साधनोंका ज्ञाता, स्वाध्यायपरायण और पवित्र होकर नित्य यज्ञोंद्वारा यजन करे। जितेन्द्रिय होकर ब्राह्मणोंका सत्कार करते हुए समस्त वर्णोंकी उन्नति चाहे। गृहस्थके व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन दो ही समय भोजन करे। यज्ञशेष अन्नका ही आहार करे। आहारपर काबू रखे। सम्पूर्ण कामनाओंको त्याग दे। अहंकारशून्य होकर विधिपूर्वक आहुति देते हुए अग्निहोत्र कर्मका सम्पादन करे। सबका आतिथ्य-सत्कार करके अवशिष्ट अन्नका स्वयं भोजन करे। त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रोच्चारणपूर्वक परिचर्या करे। ऐसा करनेवाला वैश्य द्विज होता है। वह वैश्य पवित्र एवं महान् क्षत्रियकुलमें जन्म लेता है॥ ३०—३४॥ स वैश्यः क्षत्रियो जातो जन्मप्रभृति संस्कृतः । उपनीतो व्रतपरो द्विजो भवति सत्कृतः ॥ ३५ ॥ ददाति यजते यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । अधीत्य स्वर्गमन्विच्छंस्त्रेताग्निशरणः सदा ॥ ३६ ॥ आर्तहस्तप्रदो नित्यं प्रजा धर्मेण पालयन् । सत्यः सत्यानि कुरुते नित्यं यः सुखदर्शनः ॥ ३७ ॥ क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ वह वैश्य जन्मसे ही क्षत्रियोचित संस्कारसे सम्पन्न हो उपनयनके पश्चात् ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो सर्वसम्मानित द्विज होता है। वह दान देता है, पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करता है, वेदोंका अध्ययन करके स्वर्गकी इच्छा रखकर सदा त्रिविध अग्नियोंकी शरण ले उनकी आराधना करता है, दुःखी एवं पीड़ित मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, प्रतिदिन प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, स्वयं सत्यपरायण होकर सत्यपूर्ण व्यवहार करता है तथा दर्शनसे ही सबके लिये सुखद होता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय अथवा राजा है॥ ३५—३७॥
धर्मदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासकः । यन्त्रितः कार्यकारणैः षड्भागकृतलक्षणः ॥ ३८ ॥ धर्मानुसार अपराधीको दण्ड दे। दण्डका त्याग न करे। प्रजाको धर्मकार्यका उपदेश दे। राजकार्य करनेके लिये नियम और विधानसे बँधा रहे। प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करे ॥ ३८ ॥
ग्राम्यधर्मं न सेवेत स्वच्छन्देनार्थकोविदः । ऋतुकाले तु धर्मात्मा पत्नीमुपशयेत् सदा ॥ ३९ ॥ कार्यकुशल धर्मात्मा क्षत्रिय स्वच्छन्दतापूर्वक ग्राम्य धर्म (मैथुन) का सेवन न करे। केवल ऋतुकालमें ही सदा पत्नीके निकट शयन करे ॥ ३९ ॥
सदोपवासी नियतः स्वाध्यायनिरतः शुचिः । बर्हिष्कान्तरिते नित्यं शयानोऽग्निगृहे सदा ॥ ४० ॥ सदा उपवास करे अर्थात् एकादशी आदिके दिन उपवास करे और दूसरे दिन भी सदा दो ही समय भोजन करे। बीचमें कुछ न खाय। नियमपूर्वक रहे, वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहे, पवित्र हो प्रतिदिन अग्निशालामें कुशकी चटाईपर शयन करे ॥ ४० ॥
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य कुर्वाणः सुमनाः सदा । शूद्राणां चान्नकामानां नित्यं सिद्धमिति ब्रुवन् ॥ ४१ ॥ क्षत्रिय सदा प्रसन्नतापूर्वक सबका आतिथ्य-सत्कार करते हुए धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें। शूद्र भी यदि अन्नकी इच्छा रखकर उसके लिये प्रार्थना करे तो क्षत्रिय उनके लिये सदा यही उत्तर दे कि तुम्हारे लिये भोजन तैयार है, चलो कर लो ॥ ४१ ॥
अर्थाद् वा यदि वा कामान्न किंचिदुपलक्षयेत् । पितृदेवातिथिकृते साधनं कुरुते च यः ॥ ४२ ॥ वह स्वार्थ या कामनावश किसी वस्तुका प्रदर्शन न करे। जो पितरों, देवताओं तथा अतिथियोंकी सेवाके लिये चेष्टा करता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय है ॥ ४२ ॥
स्ववेश्मनि यथान्यायमुपास्ते भैक्ष्यमेव च । त्रिकालमग्निहोत्रं च जुह्वानो वै यथाविधि ॥ ४३ ॥ क्षत्रिय अपने ही घरमें न्यायपूर्वक भिक्षा (भोजन) करे। तीनों समय विधिवत् अग्निहोत्र करता रहे ॥ ४३ ॥
गोब्राह्मणहितार्थाय रणे चाभिमुखो हतः । त्रेताग्निमन्त्रपूतात्मा समाविश्य द्विजो भवेत् ॥ ४४ ॥ वह धर्ममें स्थित हो त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रपूर्वक परिचर्यासे पवित्रचित्त हो यदि गौओं तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये समरमें शत्रु का सामना करते हुए मारा जाय तो दूसरे जन्ममें ब्राह्मण होता है ॥ ४४ ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नः संस्कृतो वेदपारगः ।
विप्रो भवति धर्मात्मा क्षत्रियः स्वेन कर्मणा ॥ ४५ ॥ इस प्रकार धर्मात्मा क्षत्रिय अपने कर्मसे जन्मान्तरमें ज्ञानविज्ञानसम्पन्न, संस्कारयुक्त तथा वेदोंका पारंगत विद्वान् ब्राह्मण होता है ॥ ४५ ॥
एतैः कर्मफलैर्देवि न्यूनजातिकुलोद्भवः । शूद्रोऽप्यागमसम्पन्नो द्विजो भवति संस्कृतः ॥ ४६ ॥ देवि! इन कर्मफलोंके प्रभावसे नीच जाति एवं हीन कुलमें उत्पन्न हुआ शूद्र भी जन्मान्तरमें शास्त्रज्ञान-सम्पन्न और संस्कारयुक्त ब्राह्मण होता है ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणो वाप्यसद्वृत्तः सर्वसंकरभोजनः । ब्राह्मण्यं स समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशः ॥ ४७ ॥ ब्राह्मण भी यदि दुराचारी होकर सम्पूर्ण संकर जातियोंके घर भोजन करने लगे तो वह ब्राह्मणत्वका परित्याग करके वैसा ही शूद्र बन जाता है ॥ ४७ ॥
कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः । शूद्रोऽपि द्विजवत् सेव्य इति ब्रह्माब्रवीत् स्वयम् ॥ ४८ ॥ देवि! शूद्र भी यदि जितेन्द्रिय होकर पवित्र कर्मोंके अनुष्ठानसे अपने अन्तःकरणको शुद्ध बना लेता है, वह द्विजकी ही भाँति सेव्य होता है—यह साक्षात् ब्रह्माजीका कथन है ॥ ४८ ॥
स्वभावः कर्म च शुभं यत्र शूद्रेऽपि तिष्ठति । विशिष्टः स द्विजातेर्वै विज्ञेय इति मे मतिः ॥ ४९ ॥ मेरा तो ऐसा विचार है कि यदि शूद्रके स्वभाव और कर्म दोनों ही उत्तम हों तो वह द्विजातिसे भी बढ़कर माननेयोग्य है ॥ ४९ ॥
न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च संततिः । कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम् ॥ ५० ॥ ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिमें न तो केवल योनि, न संस्कार, न शास्त्रज्ञान और न संतति ही कारण है। ब्राह्मणत्वका प्रधान हेतु तो सदाचार ही है ॥ ५० ॥
सर्वोऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते । वृत्ते स्थितस्तु शूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं नियच्छति ॥ ५१ ॥ लोकमें यह सारा ब्राह्मणसमुदाय सदाचारसे ही अपने पदपर बना हुआ है। सदाचारमें स्थित रहनेवाला शूद्र भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकता है ॥ ५१ ॥
ब्राह्मः स्वभावः सुश्रोणि समः सर्वत्र मे मतिः । निर्गुणं निर्मलं ब्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः ॥ ५२ ॥ सुश्रोणि! ब्रह्मका स्वभाव सर्वत्र समान है। जिसके भीतर उस निर्गुण और निर्मल ब्रह्मका ज्ञान है, वही वास्तवमें ब्राह्मण है, ऐसा मेरा विचार है ॥ ५२ ॥
एते योनिफला देवि स्थानभागनिदर्शकाः ।
स्वयं च वरदेनोक्ता ब्रह्मणा सृजता प्रजाः ॥ ५३ ॥
देवि! ये जो चारों वर्णोंके स्थान और विभाग बतलाये गये हैं, ये उस-उस जातिमें जन्म ग्रहण करनेके फल हैं। प्रजाकी सृष्टि करते समय वरदाता ब्रह्माजीने स्वयं ही यह बात कही है ॥ ५३ ॥
ब्राह्मणोऽपि महत् क्षेत्रं लोके चरति पादवत् ।
यत् तत्र बीजं वपति सा कृषिः प्रेत्य भाविनी ॥ ५४ ॥
भामिनि! ब्राह्मण संसारमें एक महान् क्षेत्र है। दूसरे क्षेत्रोंकी अपेक्षा इसमें विशेषता इतनी ही है कि यह पैरोंसे युक्त चलता-फिरता खेत है। इस क्षेत्रमें जो बीज डाला जाता है, वह परलोकके लिये जीविकाकी साधनरूप खेतीके रूपमें परिणत हो जाता है ॥ ५४ ॥
विघसाशिना सदा भाव्यं सत्पथालम्बिना तथा ।
ब्राह्मं हि मार्गमाक्रम्य वर्तितव्यं बुभूषता ॥ ५५ ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मणको उचित है कि वह सज्जनोंके मार्गका अवलम्बन करके सदा अतिथि और पोष्यवर्गको भोजन करानेके बाद अन्न ग्रहण करे, वेदोक्त पथका आश्रय लेकर उत्तम बर्ताव करे ॥ ५५ ॥
संहिताध्यायिना भाव्यं गृहे वै गृहमेधिना ।
नित्यं स्वाध्यायिना भाव्यं न चाध्ययनजीविना ॥ ५६ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण घरमें रहकर प्रतिदिन संहिताका पाठ और शास्त्रोंका स्वाध्याय करे। अध्ययनको जीविकाका साधन न बनावे ॥ ५६ ॥
एवंभूतो हि यो विप्रः सत्पथं सत्यथे स्थितः ।
आहिताग्निरधीयानो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५७ ॥
इस प्रकार जो ब्राह्मण सन्मार्गपर स्थित हो सत्पथका ही अनुसरण करता है तथा अग्निहोत्र एवं स्वाध्यायपूर्वक जीवन बिताता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥
ब्राह्मण्यं देवि सम्प्राप्य रक्षितव्यं यतात्मना ।
योनिप्रतिग्रहादानैः कर्मभिश्च शुचिस्मिते ॥ ५८ ॥
देवि! शुचिस्मिते! मनुष्यको चाहिये कि वह ब्राह्मणत्वको पाकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए योनि, प्रतिग्रह और दानकी शुद्धि एवं सत्कर्मोंद्वारा उसकी रक्षा करे ॥ ५८ ॥
एतत् ते गुह्यमाख्यातं यथा शूद्रो भवेद् द्विजः ।
ब्राह्मणो वा च्युतो धर्माद् यथा शूद्रत्वमाप्नुते ॥ ५९ ॥
गिरिराजकुमारी! शूद्र धर्माचरण करनेसे जिस प्रकार ब्राह्मणत्वको प्राप्त करता है तथा ब्राह्मण स्वधर्मका त्याग करके जातिसे भ्रष्ट होकर जिस प्रकार शूद्र हो जाता है, यह गूढ़ रहस्यकी बात मैंने तुम्हें बतला दी ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४३ ॥
बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश देवासुरनमस्कृत ।
धर्माधर्मौ नृणां देव ब्रूहि मेऽसंशयं विभो ॥ १ ॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वभूतेश्वर देवासुरवन्दित देव! विभो! अब मुझे धर्म और अधर्मका स्वरूप बताइये; जिससे उनके विषयमें मेरा संदेह दूर हो जाय ॥ १ ॥
कर्मणा मनसा वाचा त्रिविधं हि नरः सदा ।
बध्यते बन्धनैः पाशैर्मुच्यतेऽप्यथवा पुनः ॥ २ ॥
मनुष्य मन, वाणी और क्रिया—इन तीन प्रकारके बन्धनोंसे सदा बँधता है और फिर उन बन्धनोंसे मुक्त होता है ॥ २ ॥
केन शीलेन वृत्तेन कर्मणा कीदृशेन वा ।
समाचारैर्गुणैः कैर्वा स्वर्गं यान्तीह मानवाः ॥ ३ ॥
प्रभो! किस शील-स्वभावसे, किस बर्तावसे, कैसे कर्मसे तथा किन सदाचारों अथवा गुणोंद्वारा मनुष्य बँधते, मुक्त होते एवं स्वर्गमें जाते हैं ॥ ३ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
देवि धर्मार्थतत्त्वज्ञे धर्मनित्ये दमे रते ।
सर्वप्राणिहितः प्रश्नः श्रूयतां बुद्धिवर्धनः ॥ ४ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाली, सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली, इन्द्रियसंयम-परायणे देवि! तुम्हारा प्रश्न समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है, इसका उत्तर सुनो ॥
सत्यधर्मरताः सन्तः सर्वलिङ्गविवर्जिताः ।
धर्मलब्धार्थभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ५ ॥
जो मनुष्य धर्मसे उपार्जित किये हुए धनको भोगते हैं, सम्पूर्ण आश्रमसम्बन्धी चिह्नोंसे बिलग रहकर भी सत्य, धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं ॥ ५ ॥
नाधर्मेण न धर्मेण बध्यन्ते छिन्नसंशयाः ।
प्रलयोत्पत्तितत्त्वज्ञाः सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनः ॥ ६ ॥
जिनके सब प्रकारके संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्तिके तत्त्वको जाननेवाले, सर्वज्ञ और सर्वद्रष्टा हैं, वे महात्मा न तो धर्मसे बँधते हैं और न अधर्मसे ।। ६ ।। वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः । कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन ।। ७ ।। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसीकी हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनोंसे मुक्ता हो जाते हैं ।। ७ ।। ये न सज्जन्ति कस्मिंश्चित् ते न बध्यन्ति कर्मभिः । प्राणातिपाताद् विरताः शीलवन्तो दयान्विताः ।। ८ ।। तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनैः । जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसीके प्राणोंकी हत्यासे दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनोंमें नहीं पड़ते, जिनके लिये शत्रु और प्रिय मित्र दोनों समान हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।। ८ १/२ ।। सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्याः सर्वजन्तुषु ।। ९ ।। त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नराः स्वर्गगामिनः । जो सब प्राणियोंपर दया करनेवाले, सब जीवोंके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणोंको त्याग देनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। ९ १/२ ।। परस्वे निर्ममा नित्यं परदारविवर्जकाः ।। १० ।। धर्मलब्धान्नभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः । जो दूसरोंके धनपर ममता नहीं रखते, परायी स्त्रीसे सदा दूर रहते और धर्मके द्वारा प्राप्त किये अन्नका ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १० १/२ ।। मातृवत् स्वसृवच्चैव नित्यं दुहितृवच्च ये ।। ११ ।। परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः । जो मानव परायी स्त्रीको माता, बहिन और पुत्रीके समान समझकर तदनुरूप बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ११ १/२ ।। स्तैन्यान्निवृत्ताः सततं संतुष्टाः स्वधनेन च ।। १२ ।। स्वभाग्यान्युपजीवन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः । जो सदा अपने ही धनसे संतुष्ट रहकर चोरी-चमारीसे अलग रहते हैं तथा जो अपने भाग्यपर ही भरोसा रखकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। १२ १/२ ।। स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिनः ।। १३ ।। अग्राम्यसुखभोगाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः । जो अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करते हैं और ग्राम्य सुख-भोगोंमें आसक्त नहीं होते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १३ १/२ ।।
परदारेषु ये नित्यं चरित्रावृतलोचनाः ॥ १४ ॥
जितेन्द्रियाः शीलपरास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो अपने सदाचारके द्वारा सदा ही परायी स्त्रियोंकी ओरसे अपनी आँखें बंद किये रहते हैं, वे जितेन्द्रिय और शीलपरायण मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ॥ १४ १/२ ॥
एष देवकृतो मार्गः सेवितव्यः सदा नरैः ॥ १५ ॥
अकषायकृतश्चैव मार्गः सेव्यः सदा बुधैः ।
यह देवताओंका बनाया हुआ मार्ग है। राग और द्वेषको दूर करनेके लिये इस मार्गकी प्रवृति हुई है। अतः साधारण मनुष्यों तथा विद्वान् पुरुषोंको भी सदा ही इसका सेवन करना चाहिये ॥ १५ १/२ ॥
दानधर्मतपोयुक्तः शीलशौचदयात्मकः ॥ १६ ॥
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा सेवितव्यः सदा नरैः ॥
स्वर्गवासमभीप्सद्भिर्न सेव्यस्त्वत उत्तरः ॥ १७ ॥
यह दान, धर्म और तपस्यासे युक्त तथा शील, शौच और दयामय मार्ग है। मनुष्यको जीविका एवं धर्मके लिये सदा ही इस मार्गका सेवन करना चाहिये। जो स्वर्गलोकमें निवास करना चाहता हो, उनके लिये सेवन करनेयोग्य इससे बढ़कर उत्कृष्ट मार्ग नहीं है ॥
उमोवाच
वाचा तु बध्यते येन मुच्यतेऽप्यथवा पुनः ।
तानि कर्माणि मे देव वद भूतपतेऽनघ ॥ १८ ॥
उमाने पूछा—निष्पाप भूतनाथ! महादेव! कैसी वाणी बोलने अथवा उस वाणीद्वारा कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता या उस बन्धनसे छुटकारा पा जाता है? उन वाचिक कर्मोंका मुझसे वर्णन कीजिये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रयात् तथा ।
ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १९ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—जो हँसी और परिहासका सहारा लेकर भी अपने या दूसरेके लिये कभी झूठ नहीं बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १९ ॥
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा कामकारात् तथैव च ।
अनृतं ये न भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २० ॥
जो आजीविका अथवा धर्मके लिये तथा स्वेच्छाचारसे भी कभी असत्य भाषण नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥ २० ॥
श्लक्ष्णां वाणीं निराबाधां मधुरां पापवर्जिताम् ।
स्वागतेनाभिभाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २१ ॥
जो स्निग्ध, मधुर, बाधारहित और पापशून्य तथा स्वागत-सत्कारके भावसे युक्त वाणी बोलते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। २१ ।।
परुषं ये न भाषन्ते कटुकं निष्ठुरं तथा।
अपैशुन्यरताः सन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २२ ॥
जो किसीकी चुगली नहीं खाते और कभी किसीसे रूखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुँहसे नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्गमें जाते हैं ।। २२ ।।
पिशुनां न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम्।
ऋतं मैत्रं तु भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २३ ॥
जो दो मित्रोंमें फूट डालनेवाली चुगलीकी बातें नहीं करते हैं, सत्य और मैत्रीभावसे युक्त वचन बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। २३ ।।
ये वर्जयन्ति परुषं परद्रोहं च मानवाः।
सर्वभूतसमा दान्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २४ ॥
जो मानव दूसरोंसे तीखी बातें बोलना और द्रोह करना छोड़ देते हैं, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखने-वाले और जितेन्द्रिय होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
शठप्रलापाद् विरता विरुद्धपरिवर्जकाः।
सौम्यप्रलापिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २५ ॥
जिनके मुँहसे कभी शठतापूर्ण बात नहीं निकलती, जो विरोधयुक्त वाणीका त्याग करते हैं और सदा सौम्य (कोमल) वाणी बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
न कोपाद् व्याहरन्ते ये वाचं हृदयदारणीम्।
सान्त्वं वदन्ति क्रुद्धाऽपि ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २६ ॥
जो क्रोधमें आकर भी हृदयको विदीर्ण करनेवाली बात मुँहसे नहीं निकालते हैं तथा क्रुद्ध होनेपर भी सान्त्वनापूर्ण वचन ही बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। २६ ।।
एष वाणीकृतो देवि धर्मः सेव्यः सदा नरैः।
शुभः सत्यगुणो नित्यं वर्जनीयो मृषा बुधैः ॥ २७ ॥
देवि! यह वाणीजनित धर्म बताया गया है। मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये। विद्वानोंको उचित है कि वे सदा शुभ और सत्य वचन बोलें तथा मिथ्याका परित्याग करें* ।। २७ ।।
उमोवाच
मनसा बध्यते येन कर्मणा पुरुषः सदा।
तन्मे ब्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृत् ॥ २८ ॥
उमाने पूछा— महाभाग! पिनाकधारी देवदेव! जिस मानसिक कर्मसे मनुष्य सदा बन्धनमें पड़ता है, उसको मुझे बताइये ।। २८ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मानसेनेह धर्मेण संयुक्ताः पुरुषाः सदा । स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तयतः शृणु ॥ २९ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! जो सदा मानसिक धर्मसे युक्त हैं अर्थात् मनसे धर्मका ही चिन्तन और आचरण करते हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं। मैं इस विषयमें जो बताता हूँ, उसे सुनो ॥ २९ ॥
दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीततरा कृतिः । मनो बध्यति येनेह शृणु वाक्यं शुभानने ॥ ३० ॥ शुभानने! मनमें दुर्विचार आनेसे मनुष्यके कार्य भी दुर्नीतिपूर्ण एवं दूषित होते हैं, जिससे मन बन्धनमें पड़ जाता है। इस विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३० ॥
अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं दृश्यते यदा । मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३१ ॥ जब दूसरेका धन निर्जन वनमें पड़ा हुआ दिखायी दे, उस समय भी जो उसकी ओर मन ललचाकर किसीकी हिंसा नहीं करते, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ॥
ग्रामे गृहे वा ये द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम् । नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३२ ॥ गाँव या घरके एकान्त स्थानमें पड़े हुए पराये धनका जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३२ ॥
तथैव परदारान् ये कामवृत्तान् रहोगतान् । मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्तमें प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियोंको मनसे भी उनके साथ अन्याय करनेका विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३३ ॥
शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः । भजन्ति मैत्राः संगम्य ते नसः स्वर्गगामिनः ॥ ३४ ॥ जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रको भी सदा समान हृदयसे अपनाते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३४ ॥
श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः । स्वैरर्थैः परिसंतुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३५ ॥ जो शास्त्रज्ञ, दयालु पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ और अपने ही धनसे संतुष्ट होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३५ ॥
अवैरा ये त्वनायासा मैत्रीचित्तरताः सदा । सर्वभूतदयावन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३६ ॥