महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1193, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ।। २१ ।।
ब्राह्मणत्वं शुभं प्राप्य दुर्लभं योऽवमन्यते । अभोज्यान्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात् पतेत वै ।। २२ ।। जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर उसकी अवहेलना करता है और नहीं खानेयोग्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है ।। २२ ।।
सुरापो ब्रह्महा क्षुद्रचोरो भग्नव्रतोऽशुचिः । स्वाध्यायवर्जितः पापो लुब्धो नैकृतिकः शठः ।। २३ ।। अव्रती वृषलीभर्ता कुण्डाशी सोमविक्रयी । निहीनसेवी विप्रो हि पतति ब्रह्मयोनितः ।। २४ ।। शराबी, ब्रह्महत्यारा, नीच, चोर, व्रतभंग करनेवाला, अपवित्र, स्वाध्यायहीन, पापी, लोभी, कपटी, शठ, व्रतका पालन न करनेवाला, शूद्रजातिकी स्त्रीका स्वामी, कुण्डाशी (पतिके जीते-जी उत्पन्न किये हुए जारज पुत्रके घरमें खानेवाला अथवा पाकपात्रमें ही भोजन करनेवाला), सोमरस बेचनेवाला और नीचसेवी ब्राह्मण ब्राह्मणकी योनिसे भ्रष्ट हो जाता है ।। २३-२४ ।।
गुरुतल्पी गुरुद्रोही गुरुकुत्सारतिश्च यः । ब्रह्मविच्चापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनितः ।। २५ ।। जो गुरुकी शय्यापर सोनेवाला, गुरुद्रोही और गुरुनिन्दामें अनुरक्त है, वह ब्राह्मण वेदवेत्ता होनेपर भी ब्रह्मयोनिसे नीचे गिर जाता है ।। २५ ।।
एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा । शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत् ।। २६ ।। देवि! इन्हीं शुभ कर्मों और आचरणोंसे शूद्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त होता है और वैश्य क्षत्रियत्वको ।।
शूद्रकर्माणि सर्वाणि यथान्यायं यथाविधि । शुश्रूषां परिचर्यां च ज्येष्ठे वर्णे प्रयत्नतः ।। २७ ।। कुर्यादविमनाः शूद्रः सततं सत्पथे स्थितः । देवद्विजातिसत्कर्ता सर्वातिथ्यकृतव्रतः ।। २८ ।। ऋतुकालाभिगामी च नियतो नियताशनः । चोक्षंश्चोक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः ।। २९ ।। वृथामांसं न भुञ्जीत शूद्रो वैश्यत्वमृच्छति । शूद्र अपने सभी कर्मोंको न्यायानुसार विधिपूर्वक सम्पन्न करे। अपनेसे ज्येष्ठ वर्णकी सेवा और परिचर्यामें प्रयत्नपूर्वक लगा रहे। अपने कर्तव्यपालनसे कभी ऊबे नहीं। सदा सन्मार्गपर स्थित रहे। देवताओं और द्विजोंका सत्कार करे। सबके आतिथ्यका व्रत लिये रहे। ऋतुकालमें ही स्त्रीके साथ समागम करे। नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करे।