भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1192, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1192

दूसरे जन्ममें शूद्रकी योनिमें जन्म पाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य कोई भी क्यों न हो, वह शूद्रभावको प्राप्त होता है ।। १३-१४ ।।

यस्तु बुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवान् शुचिः । धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ।। १५ ।। जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।। १५ ।।

इदं चैवापरं देवि ब्रह्मणा समुदाहृतम् । अध्यात्मं नैष्ठिकं सद्भिर्धर्मकामैर्निषेव्यते ।। १६ ।। देवि! ब्रह्माजीने यह एक बात और बतायी है—धर्मकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको आजीवन अध्यात्म-तत्त्वका ही सेवन करना चाहिये ।। १६ ।।

उग्रान्नं गर्हितं देवि गणान्नं श्राद्धसूतकम् । दुष्टान्नं नैव भोक्तव्यं शूद्रान्नं नैव कर्हिचित् ।। १७ ।। देवि! उग्रस्वभावके मनुष्यका अन्न निन्दित माना गया है। किसी समुदायका, श्राद्धका, जननाशौचका, दुष्ट पुरुषका और शूद्रका अन्न भी निषिद्ध है—उसे कभी नहीं खाना चाहिये ।। १७ ।।

शूद्रान्नं गर्हितं देवि सदा देवैर्महात्मभिः । पितामहमुखोत्सृष्टं प्रमाणमिति मे मतिः ।। १८ ।। देवताओं और महात्मा पुरुषोंने शूद्रके अन्नकी सदा ही निन्दा की है। इस विषयमें पितामह ब्रह्माजीके श्रीमुखका वचन प्रमाण है, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १८ ।।

शूद्रान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विजः । आहिताग्निस्तथा यज्वा स शूद्रगतिभाग् भवेत् ।। १९ ।। जो ब्राह्मण पेटमें शूद्रका अन्न लिये मर जाता है, वह अग्निहोत्री अथवा यज्ञ करनेवाला ही क्यों न रहा हो, उसे शूद्रकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १९ ।।

तेन शूद्रान्नशेषेण ब्रह्मस्थानादपाकृतः । ब्राह्मणः शूद्रतामेति नास्ति तत्र विचारणा ।। २० ।। उदरमें शूद्रान्नका शेषभाग स्थित होनेके कारण ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे वंचित हो शूद्रभावको प्राप्त होता है; इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २० ।।

यस्यान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विजः । तां तां योनिं व्रजेद् विप्रो यस्यान्नमुपजीवति ।। २१ ।। उदरमें जिसके अन्नका अवशेष लेकर जो ब्राह्मण मृत्युको प्राप्त होता है, वह उसीकी योनिमें जाता है। जिसके अन्नसे जीवन-निर्वाह करता है, उसीकी योनिमें जन्म ग्रहण करता