भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1186, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1186

महान् पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।।

उमोवाच

आश्रमाभिरता देव तापसा ये तपोधनाः । दीप्तिमन्तः कया चैव चर्ययाथ भवन्ति ते ।। ३४ ।। उमाने पूछा—देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं? ।। ३४ ।। राजानो राजपुत्राश्च निर्धना ये महाधनाः । कर्मणा केन भगवन् प्राप्नुवन्ति महाफलम् ।। ३५ ।। भगवन्! जो राजा या राजकुमार हैं अथवा जो निर्धन या महाधनी हैं, वे किस कर्मके प्रभावसे महान् फलके भागी होते हैं? ।। ३५ ।। नित्यं स्थानमुपागम्य दिव्यचन्दनभूषिताः । केन वा कर्मणा देव भवन्ति वनगोचराः ।। ३६ ।। देव! वनवासी मुनि किस कर्मसे दिव्य स्थानको पाकर दिव्य चन्दनसे विभूषित होते हैं? ।। ३६ ।। एतन्मे संशयं देव तपश्चर्याऽऽश्रितं शुभम् । शंस सर्वमशेषेण त्र्यक्ष त्रिपुरनाशन ।। ३७ ।। देव! त्रिपुरनाशन त्रिलोचन! तपस्याके आश्रित शुभ फलके विषयमें मेरा यही संदेह है। इस सारे संदेहका उत्तर आप पूर्णरूपसे प्रदान करें ।। ३७ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

उपवासव्रतैर्दान्ता ह्यहिंस्राः सत्यवादिनः । संसिद्धाः प्रेत्य गन्धर्वैः सह मोदन्त्यनामयाः ।। ३८ ।। श्रीमहेश्वरने कहा—जो उपवास व्रतसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, हिंसारहित और सत्यवादी होकर सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, वे मृत्युके पश्चात् रोग-शोकसे रहित हो गन्धर्वोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ।। ३८ ।। मण्डूकयोगशयनो यथान्यायं यथाविधि । दीक्षां चरति धर्मात्मा स नागैः सह मोदते ।। ३९ ।। जो धर्मात्मा पुरुष न्यायानुसार विधिपूर्वक हठयोग-प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अनुसार शयन करता और यज्ञकी दीक्षा लेता है, वह नागलोकमें नागोंके साथ सुख भोगता है ।। ३९ ।। शष्पं मृगमुखोच्छिष्टं यो मृगैः सह भक्षति ।