भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1187, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1187

दीक्षितो वै मुदा युक्तः स गच्छत्यमरावतीम् ।। ४० ।। जो मृगचर्या-व्रतकी दीक्षा ले मृगोंके मुखसे उच्छिष्ट हुई घासको प्रसन्नतापूर्वक उन्हींके साथ रहकर भक्षण करता है, वह मृत्युके पश्चात् अमरावतीपुरीमें जाता है ।। शैवालं शीर्णपर्णं वा तद्व्रती यो निषेवते । शीतयोगवहो नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् ।। ४१ ।। जो व्रतधारी वानप्रस्थ मुनि सेवार अथवा जीर्ण-शीर्ण पत्तेका आहार करता तथा जाड़ेमें प्रतिदिन शीतका कष्ट सहन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ।। ४१ ।। वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा फलमूलाशनोऽपि वा । यक्षेष्वैश्वर्यमाधाय मोदतेऽप्सरसां गणैः ।। ४२ ।। जो वायु, जल, फल अथवा मूल खाकर रहता है, वह यक्षोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ४२ ।। अग्नियोगवहो ग्रीष्मे विधिदृष्टेन कर्मणा । चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि राजा भवति पार्थिवः ।। ४३ ।। जो गर्मीमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पंचाग्नि सेवन करता है, वह बारह वर्षोंतक उक्त व्रतका पालन करके जन्मान्तरमें भूमण्डलका राजा होता है ।। ४३ ।। आहारनियमं कृत्वा मुनिर्द्वादशवार्षिकम् । मरुं संसाध्य यत्नेन राजा भवति पार्थिवः ।। ४४ ।। जो मुनि बारह वर्षोंतक आहारका संयम करता हुआ यत्नपूर्वक मरु-साधना करके अर्थात् जलको भी त्यागकर तप करता है, वह भी इस पृथ्वीका राजा होता है ।। ४४ ।। स्थण्डिले शुद्धमाकाशं परिगृह्य समन्ततः । प्रविश्य च मुदा युक्तो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।। ४५ ।। देहं चानशने त्यक्त्वा स स्वर्गे सुखमेधते । जो वानप्रस्थ अपने चारों ओर विशुद्ध आकाशको ग्रहण करता हुआ खुले मैदानमें वेदीपर सोता और बारह वर्षोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक व्रतकी दीक्षा ले उपवास करके अपना शरीर त्याग देता है, वह स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ।। ४५ १/२ ।। स्थण्डिलस्य फलान्याहुर्यानानि शयनानि च ।। ४६ ।। गृहाणि च महार्हाणि चन्द्रशुभ्राणि भामिनि । भामिनि! वेदीपर शयन करनेसे प्राप्त होनेवाले फल इस प्रकार बताये गये हैं—सवारी, शय्या और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल बहुमूल्य गृह ।। ४६ १/२ ।। आत्मानमुपजीवन् यो नियतो नियताशनः ।। ४७ ।। देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्गं समुपश्नुते ।