भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1185, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1185

सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराओंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् श्रोतुमिच्छामि वालखिल्यांस्तपोधनान् ।। उमाने कहा— भगवन्! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

धर्मचर्यां तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु ।। मृगनिर्मोकवसना निर्द्वन्द्वास्ते तपोधनः । अङ्गुष्ठमात्राः सुश्रोणि तेष्वेवाङ्गेषु संयुताः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं।। उद्यन्तं सततं सूर्य स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः । भास्करस्येव किरणैः सहसा यान्ति नित्यदा ।। द्योतयन्तो दिशः सर्वा धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ।। वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।। तेष्वेव निर्मलं सत्यं लोकार्थं तु प्रतिष्ठितम् । लोकोऽयं धार्यते देवि तेषामेव तपोबलात् ।। महात्मनां तु तपसा सत्येन च शुचिस्मिते । क्षमया च महाभागे भूतानां संस्थितिं विदुः ।। उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत् टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।। प्रजार्थमपि लोकार्थं महद्भिः क्रियते तपः । तपसा प्राप्यते सर्वं तपसा प्राप्यते फलम् ।। दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत् ।।)