महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं ॥ १५ ॥ अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नराः । अनेन कर्मणा देवि भवन्त्यधनिनो नराः ॥ १६ ॥ देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं ॥ १६ ॥ अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिनः पापतो रताः । आसनार्हस्य ये पीठं न प्रयच्छन्त्यचेतसः ॥ १७ ॥ इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं ॥ १७ ॥ मार्गार्हस्य च ये मार्गं न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः । पाद्यार्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥ वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं ॥ १८ ॥ अर्घ्यार्हान् न च सत्कारैरर्चयन्ति यथाविधि । अर्घ्यमाचमनीयं वा न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः ॥ १९ ॥ इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर्घ्य या आचमनीय नहीं देते हैं ॥ १९ ॥ गुरुं चाभिगतं प्रेम्णा गुरुवन्न बुभूषते । अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिताः ॥ २० ॥ सम्मान्यांश्चावमन्यन्ते वृद्धान् परिभवन्ति च । एवंविधा नरा देवि सर्वे निरयगामिनः ॥ २१ ॥ गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते—उन्हें गुरुवत् सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़े-बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं ॥ २०-२१ ॥ ते वै यदि नरास्तस्मान्निरयादुत्तरन्ति वै । वर्षपूगैस्ततो जन्म लभन्ते कुत्सिते कुले ॥ २२ ॥ श्वपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम् । कुलेषु तेषु जायन्ते गुरुवृद्धापचायिनः ॥ २३ ॥