महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबहुत वर्षोंके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ।। २२-२३ ।। न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः । लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वचः ।। २४ ।। सर्ववर्णप्रियकरः सर्वभूतहितः सदा । अद्वेषी सुमुखः श्लक्ष्णः स्निग्धवाणीप्रदः सदा ।। २५ ।। स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसकः । यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चयन्तवतिष्ठति ।। २६ ।। मार्गाहाय ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चयन् । अतिथिप्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजकः ।। २७ ।। एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते । ततो मानुषतां प्राप्य विशिष्टकुलजो भवेत् ।। २८ ।। देवि ! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोंका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात् मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है ।। २४—२८ ।। तत्रासौ विपुलैर्भोगैः सर्वरत्नसमायुतः । यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत् ।। २९ ।। उस जन्ममें वह महान् भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ।। २९ ।। सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृतः । स्वकर्मफलमाप्नोति स्वयमेव नरः सदा ।। ३० ।। वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोंका फल सदा स्वयं ही भोगता है ।। ३० ।। उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजनः सदा । एष धर्मो मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरितः ।। ३१ ।।