महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1215, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रेयांसं मार्गमन्विच्छन् सदा यः पृच्छति द्विजान् । धर्मान्वेषी गुणाकांक्षी स स्वर्गं समुपानुते ॥ ५५ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ॥ ५५ ॥
यदि मानुषतां देवि कदाचित् स निगच्छति । मेधावी धारणायुक्तः प्रायस्तत्राभिजायते ॥ ५६ ॥ देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ ५६ ॥
एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारकः । नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाहृतः ॥ ५७ ॥ देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है ॥ ५७ ॥
उमोवाच
अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नराः । ब्राह्मणान् वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम् ॥ ५८ ॥ पार्वतीने पूछा— भगवन्! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं ॥ ५८ ॥
व्रतवन्तो नराः केचिच्छ्रद्धाधर्मपरायणाः । अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमाः ॥ ५९ ॥ कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमभ्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं ॥ ५९ ॥
यज्वानश्च तथैवान्ये निर्होमाश्च तथापरे । केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे ॥ ६० ॥ कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ ६० ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
आगमा लोकधर्माणां मर्यादाः सर्वनिर्मिताः । प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दृढव्रताः ॥ ६१ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! शास्त्र लोकधर्मोंकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम