महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1216, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।। अधर्मं धर्ममित्याहुर्ये च मोहवशं गताः । अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता ब्रह्मराक्षसाः ।। ६२ ।। जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं ।। ६२ ।। ते चेत्कालकृतोद्योगात् सम्भवन्तीह मानुषाः । निर्होमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमाः ।। ६३ ।। वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ।। ६३ ।। एष देवि मया सर्वः संशयच्छेदनाय ते । कुशलाकुशलो नृणां व्याख्यातो धर्मसागरः ।। ६४ ।। देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है। मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ।।