भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1238, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1238

सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये। कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है॥ सर्वेषां पूर्वमारम्भांश्चिन्तयेन्न्यायपूर्वकम्। आत्मशक्तिमुपायांश्च देशकालौ च युक्तितः॥ कारणानि प्रवासं च प्रक्षेपं च फलोदयम्। एवमादीनि संचिन्त्य दृष्ट्वा दैवानुकूलताम्। अतः परं समारम्भेद् यत्रात्महितमाहितम्॥ जीविका-साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे। अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे॥ वृत्तिमेवं समासाद्य तां सदा परिपालयेत्। दैवमानुषविघ्नेभ्यो न पुनर्भ्रश्यते यथा॥ इस प्रकार अपने लिये जीविकावृत्ति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे॥ पालयन् वर्धयन् भुञ्जांस्तां प्राप्य न विनाशयेत्। क्षीयते गिरिसंकाशमश्रतो ह्यनपेक्षया॥ रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे। यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत-जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है॥ आजीवेभ्यो धनं प्राप्य चतुर्था विभजेद् बुधः। धर्मायार्थाय कामाय आपत्प्रशमनाय च॥ आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट-निवारण—इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे॥ चतुर्ष्वपि विभागेषु विधानं शृणु भामिनि॥ यज्ञार्थं चान्नदानार्थं दीनानुग्रहकारणात्॥ देवब्राह्मणपूजार्थं पितृपूजार्थमेव च॥ मूलार्थं संनिवासार्थं क्रियानित्यैश्च धार्मिकैः। एवमादिषु चान्येषु धर्मार्थं संत्यजेद् धनम्॥ भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोंके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे॥

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