महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मकार्ये धनं दद्यादनवेक्ष्य फलोदयम् । ऐश्वर्यस्थानलाभार्थं राजवाल्लभ्यकारणात् ।। वार्तायां च समारम्भेऽमात्यमित्रपरिग्रहे । आवाहे च विवाहे च पूर्णानां वृत्तिकारणात् ।। अर्थोदयसमावाप्तावनर्थस्य विघातने । एवमादिषु चान्येषु अर्थार्थं विसृजेद् धनम् ।। फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये। ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ।।
अनुबन्धं हेतुयुक्तं दृष्ट्वा वित्तं परित्यजेत् । अनर्थं बाधते ह्यर्थो अर्थं चैव फलान्युत ।। हेतुयुक्त अनुबन्ध (सकारण सम्बन्ध) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये। अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ।।
नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थं नरा यत्नशतैरपि । तस्माद् धनं रक्षितव्यं दातव्यं च विधानतः ।। निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते। अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ।।
शरीरपोषणार्थाय आहारस्य विशेषणे । एवमादिषु चान्येषु कामार्थं विसृजेद् धनम् ।। शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ।।
विचार्य गुणदोषौ तु त्रयाणां तत्र संत्यजेत् । चतुर्थं संनिदध्याच्च आपदर्थं शुचिस्मिते ।। गुण-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम-सम्बन्धी धनोंका तत्तत् कार्योंमें व्यय करना चाहिये। शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ।।
राज्यभ्रंशविनाशार्थं दुर्भिक्षार्थं च शोभने । महाव्याधिविमोक्षार्थं वार्धक्यस्यैव कारणात् ।। शत्रूणां प्रतिकाराय साहसैश्चाप्यमर्षणात् ।। प्रस्थाने चान्य देशार्थमापदां विप्रमोक्षणे । एवमादि समुद्दिश्य संनिदध्यात् स्वकं धनम् ।।